जर्मनी से नेपाल लौटे 13वीं सदी के दस्तावेज़: 800 से अधिक ऐतिहासिक पांडुलिपियाँ राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंपी
सारांश
मुख्य बातें
नेपाल की राजनीतिक, कानूनी और सांस्कृतिक विरासत से संबंधित 800 से अधिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ दशकों बाद जर्मनी से स्वदेश लौट आए हैं — इनमें से कुछ पांडुलिपियाँ 13वीं सदी की बताई जा रही हैं। 2 अक्टूबर 2026 को काठमांडू में आयोजित एक औपचारिक समारोह में इन दस्तावेज़ों को नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार को विधिवत सौंपा गया। यह नेपाल की सांस्कृतिक विरासत की पुनर्प्राप्ति की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
संग्रह में क्या-क्या शामिल है
नेपाल के विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, इस संग्रह में प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियाँ, शाही फरमान (लाल मोहर), अदालती आदेश (रुक्का), कानूनी दस्तावेज़, संस्कृत ग्रंथ और ऐतिहासिक यात्रा विवरण शामिल हैं। कैटलॉग के अनुसार संग्रह में मल्ल काल की 465 ताड़पत्र पांडुलिपियाँ, शाह और राणा काल के 312 कानूनी फरमान और शाही दस्तावेज़, राणा प्रधानमंत्रियों के कार्यालयों से संबंधित 18 पांडुलिपियाँ एवं यात्रा डायरियाँ, तथा 11 अन्य विविध पांडुलिपियाँ हैं। इनमें से कुछ ताड़पत्र पांडुलिपियों को नेपाल में बचे सबसे पुराने दस्तावेज़ों में गिना जाता है।
ये दस्तावेज़ 1780 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक अलग-अलग समय में नेपाल से एकत्र किए गए थे। जर्मनी भेजे जाने से पहले ये दिवंगत जोसेफ पीटर रिंडफ्लेश के निजी संग्रह का हिस्सा थे।
वापसी कैसे संभव हुई
रिंडफ्लेश के पुत्र वाल्टर रिंडफ्लेश ने ये दस्तावेज़ हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज से संबद्ध हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स को सौंपे। इसके बाद माइकल्स और उनकी टीम के सदस्यों डॉ. माणिक बज्राचार्य तथा राजन खतीवड़ा ने इन्हें नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल को हस्तांतरित किया। माइकल्स और वाल्टर रिंडफ्लेश की व्यक्तिगत मित्रता इस वापसी प्रक्रिया में निर्णायक कड़ी बनी। संग्रह को नेपाल भेजने से पूर्व हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी और हीडलबर्ग एकेडमी ने इसका संरक्षण और सूचीकरण किया।
यह पूरी प्रक्रिया जर्मनी स्थित नेपाली दूतावास, सराफ फाउंडेशन और नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार के सहयोग से संपन्न हुई।
सरकार की प्रतिक्रिया
हस्तांतरण समारोह में विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि इन दस्तावेज़ों की वापसी 'नेपाल के सांस्कृतिक अधिकारों और उसकी सभ्यतागत विरासत पर संप्रभु स्वामित्व की बहाली का प्रतीक है।' उन्होंने कहा कि नेपाल की कला, साहित्य, परंपराएँ और धार्मिक ग्रंथ 'केवल भौतिक अवशेष नहीं, बल्कि उसकी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं।' खनाल ने दिवंगत रिंडफ्लेश की उस अंतिम इच्छा का भी स्मरण किया, जिसमें उन्होंने अपने संग्रह के नेपाली दस्तावेज़ों को स्वदेश लौटाने की कामना व्यक्त की थी।
खनाल ने यह भी रेखांकित किया कि नेपाल और जर्मनी दोनों सांस्कृतिक संपत्ति के अवैध हस्तांतरण को प्रतिबंधित करने वाले 1970 यूनेस्को कन्वेंशन के पक्षकार हैं। उन्होंने कहा कि यह वापसी उस अंतरराष्ट्रीय समझौते के प्रति दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
विरासत संरक्षण का व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में पूर्व-औपनिवेशिक और सांस्कृतिक धरोहर की वापसी को लेकर बहस तेज़ हो रही है। नेपाल भी पिछले कई वर्षों से विभिन्न देशों में रखी अपनी कलाकृतियों और दस्तावेज़ों की स्वदेश वापसी के लिए प्रयासरत है। यह हस्तांतरण उस दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है, जहाँ अकादमिक सहयोग और व्यक्तिगत इच्छाशक्ति राजनयिक चैनलों के साथ मिलकर सफल परिणाम दे सकती है।
विदेश मंत्री खनाल ने प्रोफेसर माइकल्स और उनकी शोध टीम की 'अकादमिक ईमानदारी, शोध और लगातार प्रयासों' की सराहना करते हुए कहा कि इन्हीं प्रयासों से ऐतिहासिक सामग्रियों की वापसी संभव हुई। आने वाले दिनों में राष्ट्रीय अभिलेखागार इन दस्तावेज़ों को शोधकर्ताओं और जनता के लिए सुलभ बनाने की दिशा में कदम उठाएगा।