UNGA में नेपाल PM शाह का प्रस्ताव: भारत-चीन के साथ 'हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म' बनाएं
सारांश
मुख्य बातें
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने 25 सितंबर 2026 को नेपाल, भारत और चीन की साझेदारी में एक 'हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म' स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जिसका उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु खतरों से मिलकर निपटना है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब 26 अगस्त 2026 की विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के पहाड़ी इलाकों में भारी तबाही मचाई थी, जिसे कई विशेषज्ञों ने 'माउंटेन सुनामी' तक कहा।
आपदा का भयावह मंजर
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के आंकड़ों के अनुसार, इस बाढ़ में अब तक 1,453 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5,550 लोग अभी भी लापता हैं। लापता लोगों में 636 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्रों में बाढ़ ने बस्तियाँ, पुल, सड़कें, स्कूल और घर बहा दिए।
विशेषज्ञों ने इस आपदा को जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम बताया है। नेशनल प्लानिंग कमीशन और नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी की संयुक्त 'रैपिड डिजास्टर नीड्स असेसमेंट' (RDNA) रिपोर्ट के अनुसार, बाढ़ से लगभग 2.69 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ है और पुनर्निर्माण के लिए करीब 4.77 अरब डॉलर की ज़रूरत होगी — जो नेपाल की GDP का लगभग 10 प्रतिशत है।
प्रस्तावित तंत्र में क्या होगा
प्रधानमंत्री शाह ने स्पष्ट किया कि तीन देशों का यह प्रस्तावित तंत्र सैटेलाइट डेटा और तकनीकी जानकारी साझा करने, खतरनाक ग्लेशियल झीलों की निगरानी और क्षेत्रीय स्तर पर अर्ली वार्निंग सिस्टम को मज़बूत करने पर केंद्रित होगा। उन्होंने कहा, 'आइए, खतरनाक ग्लेशियर झीलों पर नज़र रखें। मिलकर चेतावनी देने वाले सिस्टम को मज़बूत करें। और जब कोई आपदा आए, तो सीमाओं के पार भी आपसी तालमेल से मदद पहुँचाएँ।'
गौरतलब है कि यह पहली बार है जब किसी नेपाली प्रधानमंत्री ने UNGA मंच से भारत और चीन को एक ही जलवायु-सहयोग ढाँचे में शामिल करने का खुला आह्वान किया है — यह इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि भारत और चीन के बीच स्वयं सीमा विवाद चल रहे हैं।
नेपाल की अपनी जलवायु प्रतिबद्धताएँ
शाह ने बताया कि नेपाल ने अपने लगभग आधे भू-क्षेत्र में वन क्षेत्र को पुनर्स्थापित किया है और हाइड्रोपावर (पनबिजली) उत्पादन क्षमता में तेज़ी से विस्तार कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की दर यूरोप के कुछ हिस्सों के बराबर पहुँच गई है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी 0.1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी उसे जलवायु परिवर्तन की सबसे भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। उनके शब्दों में, 'हमने यह संकट पैदा नहीं किया, लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत हम चुका रहे हैं।'
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से माँगें
शाह ने वैश्विक नेताओं से केवल राहत और पुनर्निर्माण तक सीमित न रहने की अपील की। उन्होंने छह सूत्री फ्रेमवर्क सुझाया — राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण के साथ-साथ जिम्मेदारी, नुकसान की भरपाई और मुश्किल हालात से निपटने की क्षमता। उन्होंने जलवायु-प्रभावित विकासशील देशों के लिए अनुदान-आधारित वित्तीय सहायता (जिसे कर्ज की तरह न लौटाना पड़े) बढ़ाने और बीमा व नई तकनीकों में निवेश की माँग की।
उन्होंने हिमालय को 'बंटी हुई जानकारी की सीमा' नहीं, बल्कि 'अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला' बनाने की बात कही। आने वाले महीनों में यह देखना होगा कि भारत और चीन इस प्रस्ताव पर औपचारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं।