नेपाल बाढ़ पर पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी की चेतावनी: हिमालय के बढ़ते खतरे के लिए टिकाऊ विकास अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी ने नेपाल में आई अचानक बाढ़ को लेकर 30 अगस्त को गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आपदा को केवल प्राकृतिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि इसे जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलने और हिमालय के बढ़ते भू-वैज्ञानिक खतरे की एक कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने टिकाऊ विकास और सीमा पार सहयोग को इस संकट का एकमात्र दीर्घकालिक समाधान बताया।
हिमालय की भौगोलिक नाजुकता
भवरीन कंधारी ने कहा, 'इसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा कहना सही नहीं है, क्योंकि जाहिर है कि जहां ग्लेशियर होते हैं, वहां प्राकृतिक आपदाएं तो आती ही हैं। हिमालय भी दूसरी पर्वत श्रृंखलाओं की तुलना में काफी नई पर्वत श्रृंखला है, इसलिए यह अभी भी पूरी तरह मजबूत नहीं है। इसे स्थिर होने या बसने में शायद लाखों साल लग जाएंगे।' यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी मानसूनी तबाही की खबरें सामने आ रही हैं।
मानवीय हस्तक्षेप से बढ़ता संकट
कंधारी ने चेताया कि प्राकृतिक आपदाओं को और भयावह बनाने में मानवीय गतिविधियाँ बड़ी भूमिका निभा रही हैं। उनके अनुसार, 'तापमान ऊपर जा रहे हैं। यह प्रदूषण और इको-सेंसिटिव जोन में कंस्ट्रक्शन के कारण हो रहा है। ब्लास्टिंग की जा रही है। इन्हें सिर्फ नेचुरल डिजास्टर नहीं मानकर जो गलतियां हो रही हैं, उन्हें सुधारना चाहिए।' गौरतलब है कि उत्तराखंड और हिमाचल में वृक्षों की कटाई वाले कई परियोजनाओं को लेकर विशेषज्ञ पहले भी आगाह कर चुके हैं।
समग्र दृष्टिकोण की जरूरत
उन्होंने कहा कि तापमान वृद्धि पर व्यापक अध्ययन और आकलन हो चुके हैं और मामला बेहद नाजुक है — गलती की कोई गुंजाइश नहीं। उनके अनुसार, कोयला उत्पादन, हाइड्रोपावर प्लांट निर्माण और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में अत्यधिक पर्यटन से कार्बन फुटप्रिंट बढ़ रहा है। इन सभी पहलुओं को एक साथ देखे बिना समस्या का समाधान संभव नहीं।
सीमा पार सहयोग की अपील
भवरीन कंधारी ने भारत, नेपाल और चीन सहित हिमालय से जुड़े सभी देशों से एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'हिमालय रेंज से जुड़े सभी देशों को साथ आना होगा, और साथ ही अर्ली वार्निंग और दूसरे सिग्नलिंग सिस्टम वगैरह का भी इस्तेमाल करना होगा।' उन्होंने यह भी सुझाया कि हिमालय को साझा करने वाले देशों को मिलकर आपदा-रोधी नीति तैयार करनी चाहिए।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि चित्रकूट जैसे मैदानी इलाकों में भी जलस्तर बढ़ने की घटनाएं हिमालयी जल-तंत्र के व्यापक असंतुलन का संकेत हैं। जब तक हिमालयी देश साझा पर्यावरण नीति और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर सहमत नहीं होते, तब तक इस तरह की आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती रहने की आशंका है।