31 अगस्त 2026
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नेपाल बाढ़ पर पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी की चेतावनी: हिमालय के बढ़ते खतरे के लिए टिकाऊ विकास अनिवार्य

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नेपाल बाढ़ पर पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी की चेतावनी: हिमालय के बढ़ते खतरे के लिए टिकाऊ विकास अनिवार्य

सारांश

नेपाल की अचानक बाढ़ सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं — पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी के अनुसार यह हिमालय की भू-वैज्ञानिक नाजुकता, बढ़ते तापमान और इको-सेंसिटिव जोन में अनियंत्रित निर्माण का संयुक्त परिणाम है। समाधान के लिए भारत, नेपाल और चीन को एकजुट होकर अर्ली वार्निंग सिस्टम और टिकाऊ नीति अपनानी होगी।

मुख्य बातें

पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी ने 30 अगस्त को नेपाल बाढ़ को जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर पिघलने की गंभीर चेतावनी करार दिया।
हिमालय को भूवैज्ञानिक रूप से 'नई' और अस्थिर पर्वत श्रृंखला बताया; स्थिरता के लिए लाखों वर्ष लग सकते हैं।
इको-सेंसिटिव जोन में कंस्ट्रक्शन, ब्लास्टिंग और अत्यधिक पर्यटन से आपदाएं और गंभीर हो रही हैं।
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में वनों की कटाई वाली परियोजनाओं को खतरे का कारण बताया।
भारत, नेपाल और चीन सहित हिमालयी देशों के बीच सीमा पार सहयोग और अर्ली वार्निंग सिस्टम की माँग।

पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी ने नेपाल में आई अचानक बाढ़ को लेकर 30 अगस्त को गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आपदा को केवल प्राकृतिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि इसे जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलने और हिमालय के बढ़ते भू-वैज्ञानिक खतरे की एक कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने टिकाऊ विकास और सीमा पार सहयोग को इस संकट का एकमात्र दीर्घकालिक समाधान बताया।

हिमालय की भौगोलिक नाजुकता

भवरीन कंधारी ने कहा, 'इसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा कहना सही नहीं है, क्योंकि जाहिर है कि जहां ग्लेशियर होते हैं, वहां प्राकृतिक आपदाएं तो आती ही हैं। हिमालय भी दूसरी पर्वत श्रृंखलाओं की तुलना में काफी नई पर्वत श्रृंखला है, इसलिए यह अभी भी पूरी तरह मजबूत नहीं है। इसे स्थिर होने या बसने में शायद लाखों साल लग जाएंगे।' यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी मानसूनी तबाही की खबरें सामने आ रही हैं।

मानवीय हस्तक्षेप से बढ़ता संकट

कंधारी ने चेताया कि प्राकृतिक आपदाओं को और भयावह बनाने में मानवीय गतिविधियाँ बड़ी भूमिका निभा रही हैं। उनके अनुसार, 'तापमान ऊपर जा रहे हैं। यह प्रदूषण और इको-सेंसिटिव जोन में कंस्ट्रक्शन के कारण हो रहा है। ब्लास्टिंग की जा रही है। इन्हें सिर्फ नेचुरल डिजास्टर नहीं मानकर जो गलतियां हो रही हैं, उन्हें सुधारना चाहिए।' गौरतलब है कि उत्तराखंड और हिमाचल में वृक्षों की कटाई वाले कई परियोजनाओं को लेकर विशेषज्ञ पहले भी आगाह कर चुके हैं।

समग्र दृष्टिकोण की जरूरत

उन्होंने कहा कि तापमान वृद्धि पर व्यापक अध्ययन और आकलन हो चुके हैं और मामला बेहद नाजुक है — गलती की कोई गुंजाइश नहीं। उनके अनुसार, कोयला उत्पादन, हाइड्रोपावर प्लांट निर्माण और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में अत्यधिक पर्यटन से कार्बन फुटप्रिंट बढ़ रहा है। इन सभी पहलुओं को एक साथ देखे बिना समस्या का समाधान संभव नहीं।

सीमा पार सहयोग की अपील

भवरीन कंधारी ने भारत, नेपाल और चीन सहित हिमालय से जुड़े सभी देशों से एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'हिमालय रेंज से जुड़े सभी देशों को साथ आना होगा, और साथ ही अर्ली वार्निंग और दूसरे सिग्नलिंग सिस्टम वगैरह का भी इस्तेमाल करना होगा।' उन्होंने यह भी सुझाया कि हिमालय को साझा करने वाले देशों को मिलकर आपदा-रोधी नीति तैयार करनी चाहिए।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि चित्रकूट जैसे मैदानी इलाकों में भी जलस्तर बढ़ने की घटनाएं हिमालयी जल-तंत्र के व्यापक असंतुलन का संकेत हैं। जब तक हिमालयी देश साझा पर्यावरण नीति और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर सहमत नहीं होते, तब तक इस तरह की आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती रहने की आशंका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

विशेषज्ञ बार-बार इको-सेंसिटिव जोन में अनियंत्रित निर्माण के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन नीतिगत बदलाव की गति बेहद धीमी रही है। विरोधाभास यह है कि हाइड्रोपावर और पर्यटन को 'विकास' के नाम पर बढ़ावा देने वाली वही सरकारें आपदा के बाद राहत पर करोड़ों खर्च करती हैं। सीमा पार सहयोग की अपील सैद्धांतिक रूप से सही है, लेकिन भारत-चीन के बीच मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव इसे व्यवहार में कठिन बनाते हैं। असली जवाबदेही तब तय होगी जब पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को परियोजना अनुमोदन की अनिवार्य शर्त बनाया जाए — न कि महज औपचारिकता।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नेपाल में आई अचानक बाढ़ का मुख्य कारण क्या है?
पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी के अनुसार, नेपाल की बाढ़ केवल प्राकृतिक नहीं है — इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलना और इको-सेंसिटिव जोन में अनियंत्रित निर्माण व ब्लास्टिंग जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी जिम्मेदार हैं। हिमालय की भूवैज्ञानिक अस्थिरता इन खतरों को और बढ़ा देती है।
हिमालय को भूवैज्ञानिक रूप से खतरनाक क्यों माना जाता है?
हिमालय अन्य पर्वत श्रृंखलाओं की तुलना में भूवैज्ञानिक दृष्टि से एक नई और अपेक्षाकृत अस्थिर पर्वत श्रृंखला है। भवरीन कंधारी के अनुसार, इसे पूरी तरह स्थिर होने में लाखों वर्ष लग सकते हैं, जिससे यहाँ प्राकृतिक आपदाओं की संभावना स्वाभाविक रूप से अधिक रहती है।
नेपाल जैसी आपदाओं से बचने के लिए क्या उपाय सुझाए गए हैं?
पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी ने तीन प्रमुख उपाय सुझाए हैं — इको-सेंसिटिव जोन में निर्माण और ब्लास्टिंग पर रोक, कोयला व हाइड्रोपावर परियोजनाओं की समग्र समीक्षा, और भारत-नेपाल-चीन सहित सभी हिमालयी देशों के बीच अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करना।
सीमा पार सहयोग से हिमालयी आपदाओं पर कैसे नियंत्रण होगा?
भवरीन कंधारी का कहना है कि हिमालय एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र है जो भारत, नेपाल और चीन तीनों देशों को प्रभावित करता है। इसलिए साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम, संयुक्त पर्यावरण नीति और समन्वित आपदा प्रबंधन के बिना किसी एक देश के अकेले प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।
उत्तराखंड और हिमाचल में किन गलतियों का हवाला दिया गया है?
पर्यावरणविद् के अनुसार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पेड़ों की कटाई वाली परियोजनाएं चलाई गई हैं जो पर्वतीय पारिस्थितिकी को कमजोर करती हैं। इसके अलावा अत्यधिक पर्यटन से बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट भी इन क्षेत्रों की आपदा संवेदनशीलता को बढ़ा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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