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नेपाल आपदा भारत के लिए चेतावनी: पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी बोलीं — हिमालय में अंधाधुंध निर्माण पर लगे रोक

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नेपाल आपदा भारत के लिए चेतावनी: पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी बोलीं — हिमालय में अंधाधुंध निर्माण पर लगे रोक

सारांश

नेपाल की त्रासदी सिर्फ उस देश की नहीं — यह भारत के लिए सीधी चेतावनी है। पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी कहती हैं कि हिमालय में बेलगाम सड़क निर्माण, सुरंगें और अनियंत्रित पर्यटन मिलकर एक बड़ी आपदा की ज़मीन तैयार कर रहे हैं — और बिहार, उत्तराखंड, सिक्किम जैसे राज्य सीधे निशाने पर हैं।

मुख्य बातें

पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी ने नेपाल आपदा को केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन का मिला-जुला परिणाम बताया।
बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में नदियों के जलस्तर में अचानक वृद्धि से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
हिमालय में सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण, विस्फोट से पहाड़ काटने और जलविद्युत परियोजनाओं पर पुनर्विचार की माँग।
ठेकेदारों और निर्माण एजेंसियों की निगरानी मज़बूत करने और नियम उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की ज़रूरत बताई।
हिमालयी राज्यों में पर्यटन को वहन क्षमता के अनुरूप सीमित करने की अपील; सरकारों से आपदा रोकथाम को प्राथमिकता देने का आग्रह।

पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी ने नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी त्रासदी के बाद हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती नाजुकता और भारत के सीमावर्ती राज्यों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर गंभीर आगाह किया है। उनके अनुसार, इस आपदा को महज एक प्राकृतिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता — जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ पहाड़ों में बेलगाम मानवीय हस्तक्षेप इसे और घातक बना रहा है।

जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप — दोहरा संकट

कंधारी ने कहा कि नेपाल में जो हुआ, वह बेहद दुखद और दिल दहला देने वाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन इस संकट में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों की तेज़ी से बदलती स्थिति को लेकर वैज्ञानिक संस्थाएँ पहले ही आगाह कर चुकी हैं। उन्होंने कहा, ग्लोबल वार्मिंग और जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक इस्तेमाल का वैश्विक असर हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर सीधे पड़ रहा है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नेपाल, तिब्बत और भारत को अलग-अलग भौगोलिक इकाइयों के रूप में देखकर इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नहीं समझा जा सकता। एक हिस्से में होने वाले बदलाव का प्रभाव दूसरे हिस्से पर पड़ना स्वाभाविक है। जंगलों की कटाई, सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण और तेज़ी से हो रहा बुनियादी ढाँचा विकास — ये सब मिलकर आपदा के जोखिम को कई गुना बढ़ा देते हैं।

भारत के सीमावर्ती राज्यों पर सीधा खतरा

कंधारी ने चेताया कि नेपाल और तिब्बत में ग्लेशियरों के टूटने, भारी वर्षा या भूस्खलन जैसी घटनाओं का असर सीधे भारत तक पहुँच सकता है। उन्होंने विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम का उल्लेख किया, जहाँ नदियों के जलस्तर में अचानक वृद्धि से बाढ़ और भूस्खलन का ख़तरा गंभीर रूप से बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि सीमाओं से प्रकृति के प्रभाव को नहीं रोका जा सकता — यदि नेपाल में किसी नदी या ग्लेशियर पर अत्यधिक दबाव बनता है, तो उसका पानी आगे बढ़कर भारत के इलाकों को प्रभावित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, नेपाल में फँसे या लापता भारतीय पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का मामला भी गहरी चिंता का विषय है।

चेतावनी प्रणाली से आगे — रोकथाम पर जोर

बाढ़ पूर्व-चेतावनी प्रणाली पर कंधारी ने माना कि कोई भी तकनीक पूरी तरह अचूक नहीं होती, लेकिन कुछ दिन या सप्ताह पहले की सूचना बड़ी संख्या में जानें बचा सकती है। हालाँकि, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि असली लक्ष्य केवल आपदा के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। सरकारों को आपदा रोकथाम को प्राथमिकता देनी होगी। हिमालयी क्षेत्र में सड़क निर्माण, सुरंगों की खुदाई, विस्फोट से पहाड़ काटने और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप जैसे कदमों पर गंभीर पुनर्विचार की ज़रूरत है।

विकास बनाम पर्यावरण — संतुलन की माँग

कंधारी ने विकास कार्यों का विरोध नहीं किया, लेकिन स्पष्ट किया कि हिमालय को सामान्य रियल एस्टेट परियोजना की तरह नहीं देखा जा सकता। स्थानीय लोगों के लिए सड़क और बुनियादी सुविधाएँ ज़रूरी हैं, परंतु निर्माण उतना ही हो जितना वास्तव में आवश्यक हो। उन्होंने कहा कि संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों को अनावश्यक रूप से चार लेन तक चौड़ा करने के बजाय न्यूनतम आवश्यक चौड़ाई का पालन होना चाहिए। विस्फोट से पहाड़ काटने की जगह ऐसी आधुनिक तकनीकों को अपनाना चाहिए जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुँचाएँ। साथ ही, उन्होंने ठेकेदारों, इंजीनियरों और निर्माण एजेंसियों की निगरानी मज़बूत करने और नियम उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की माँग की।

पर्यटन की वहन क्षमता पर सवाल

कंधारी ने हिमालयी राज्यों में तेज़ी से बढ़ते पर्यटन पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकारें एक ओर संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए सड़कें और हाईवे बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर वहाँ की पर्यावरणीय वहन क्षमता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनके अनुसार, हिमालय की वहन क्षमता के अनुरूप पर्यटन की सीमा तय करना अनिवार्य है। उन्होंने नेपाल की घटना को भारत के लिए एक स्पष्ट चेतावनी बताते हुए कहा कि इससे सबक लेकर हिमालय के साथ विकास की मौजूदा नीति में व्यापक और तत्काल बदलाव लाने की आवश्यकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

सिक्किम ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट (2023) और जोशीमठ भूधंसाव (2023) के बाद भी यही आवाज़ें उठी थीं, लेकिन नीतिगत बदलाव सतह तक नहीं पहुँचे। विडंबना यह है कि सरकारें एक ओर चार धाम ऑल-वेदर रोड और हिमालयी पर्यटन को बढ़ावा देती हैं, दूसरी ओर पर्यावरण प्रभाव आकलन को कमज़ोर करने के आरोप भी झेलती हैं। असली परीक्षा यह है कि क्या नेपाल की यह त्रासदी भारत में नीति-निर्माताओं को वहन क्षमता-आधारित विकास की ओर धकेलेगी — या यह भी पिछली आपदाओं की तरह कुछ हफ्तों की चर्चा बनकर रह जाएगी।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नेपाल आपदा भारत के लिए चेतावनी क्यों है?
पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी के अनुसार, नेपाल, तिब्बत और भारत एक ही हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं — एक हिस्से में ग्लेशियर टूटने या भूस्खलन का असर सीधे भारत के सीमावर्ती राज्यों तक पहुँच सकता है। बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और सिक्किम विशेष रूप से खतरे में हैं।
हिमालय में किस तरह के निर्माण कार्यों पर रोक की माँग है?
कंधारी ने सड़कों को अनावश्यक रूप से चार लेन तक चौड़ा करने, विस्फोट से पहाड़ काटने, बड़े पैमाने पर सुरंग निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भारी हस्तक्षेप पर पुनर्विचार की माँग की है। उनका कहना है कि स्थानीय ज़रूरतों के लिए न्यूनतम और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का इस्तेमाल होना चाहिए।
क्या बाढ़ चेतावनी प्रणाली इन खतरों से बचाने में सक्षम है?
कंधारी के अनुसार, कोई भी चेतावनी प्रणाली पूरी तरह अचूक नहीं होती, लेकिन कुछ दिन या सप्ताह पहले की सूचना बड़ी संख्या में जानें बचा सकती है। उन्होंने ज़ोर दिया कि असली समाधान आपदा के बाद राहत नहीं, बल्कि पहले से रोकथाम है।
हिमालयी राज्यों में पर्यटन पर क्या चिंता जताई गई है?
कंधारी ने कहा कि सरकारें संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए बुनियादी ढाँचा तो बना रही हैं, लेकिन हिमालय की पर्यावरणीय वहन क्षमता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। उन्होंने माँग की कि पर्यटन की सीमा वहन क्षमता के अनुरूप तय की जाए।
सरकारों को अभी क्या कदम उठाने चाहिए?
कंधारी ने माँग की कि निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों की निगरानी मज़बूत हो, नियम उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई हो, और हिमालय में विकास नीति में व्यापक बदलाव लाया जाए। उनके अनुसार, नेपाल की घटना को केवल सैटेलाइट निगरानी बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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