नेपाल आपदा भारत के लिए चेतावनी: पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी ने हिमालय में अंधाधुंध निर्माण पर रोक की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी ने 28 अगस्त 2026 को नेपाल में आई विनाशकारी त्रासदी के संदर्भ में गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा कि इस आपदा को महज एक प्राकृतिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। उनके अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मानवीय हस्तक्षेप — जिसमें सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण और तेज़ गति से हो रहा बुनियादी ढाँचा विकास शामिल है — आपदा के जोखिम को कई गुना बढ़ा रहा है। उन्होंने भारत के सीमावर्ती राज्यों पर मंडरा रहे संभावित खतरे को लेकर भी आगाह किया।
हिमालय एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र है
कंधारी ने स्पष्ट किया कि नेपाल, तिब्बत और भारत को अलग-अलग भौगोलिक इकाइयों के रूप में देखकर इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कहा कि एक हिस्से में होने वाले बदलाव का प्रभाव दूसरे हिस्से पर पड़ना स्वाभाविक है। हिमालयी ग्लेशियरों की तेज़ी से बदलती स्थिति को लेकर वैज्ञानिक संस्थाएँ पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं। उनके अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक इस्तेमाल का वैश्विक प्रभाव हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है।
भारत के किन राज्यों पर है सबसे अधिक खतरा
कंधारी ने बताया कि नेपाल और तिब्बत में ग्लेशियरों के टूटने, भारी बारिश या भूस्खलन जैसी घटनाओं का असर सीधे भारत तक पहुँच सकता है। खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में नदियों के जलस्तर में अचानक वृद्धि से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल में फँसे या लापता भारतीय पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की घटनाएँ भी इस संकट का एक गंभीर पहलू हैं। उनके शब्दों में, 'सीमाओं से प्रकृति के प्रभाव को रोका नहीं जा सकता।'
आपदा रोकथाम बनाम राहत-बचाव
बाढ़ चेतावनी प्रणाली पर कंधारी ने माना कि कोई भी प्रणाली पूरी तरह सटीक नहीं हो सकती, लेकिन कुछ दिन या सप्ताह पहले मिली चेतावनी से बड़ी संख्या में जानें बचाई जा सकती हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सरकारों का असली लक्ष्य केवल आपदा के बाद राहत और बचाव नहीं होना चाहिए, बल्कि आपदा रोकथाम पर अधिक ध्यान देना होगा। हिमालयी क्षेत्र में सड़क निर्माण, सुरंगों की खुदाई, पहाड़ों को विस्फोट से काटने और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप जैसे कदमों पर पुनर्विचार की ज़रूरत है।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ज़रूरी
कंधारी ने विकास कार्यों का विरोध नहीं किया, परंतु स्पष्ट किया कि हिमालय को सामान्य रियल एस्टेट परियोजना की तरह नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क को अनावश्यक रूप से चार लेन तक चौड़ा करने के बजाय न्यूनतम आवश्यक जगह का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। पहाड़ों को विस्फोट से काटने के बजाय ऐसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल होना चाहिए जिनसे पर्यावरण को कम नुकसान पहुँचे। उन्होंने ठेकेदारों, इंजीनियरों और निर्माण एजेंसियों की निगरानी मज़बूत करने तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी माँग की।
पर्यटन की वहन क्षमता पर भी उठाए सवाल
कंधारी ने हिमालयी राज्यों में तेज़ी से बढ़ते पर्यटन पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सरकारें एक तरफ संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए सड़कें और हाईवे बना रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वहाँ की पर्यावरणीय क्षमता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनके अनुसार, हिमालय की वहन क्षमता के अनुसार पर्यटन की सीमा तय करना आवश्यक है। नेपाल की घटना को भारत के लिए एक निर्णायक चेतावनी बताते हुए उन्होंने कहा कि इसे केवल राहत, बचाव और बेहतर सैटेलाइट निगरानी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए — हिमालय के साथ विकास की मौजूदा नीति में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है।