नेपाल आपदा पर वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता की चेतावनी: ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहे हिमालयी खतरा
सारांश
मुख्य बातें
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और एवलांच का खतरा जलवायु परिवर्तन के साथ तेज़ी से बढ़ रहा है — यह चेतावनी वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता ने नेपाल की हालिया प्राकृतिक आपदा के संदर्भ में दी है। उन्होंने इसरो, यूएसजीएस और आईसीआईएमओडी की सैटेलाइट तस्वीरों और शोध रिपोर्टों के आधार पर घटना की संभावित वजहों का विश्लेषण किया। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ती दिख रही हैं।
घटना का संभावित कारण
डॉ. मेहता के अनुसार, उपलब्ध शोध और सैटेलाइट आँकड़ों से संकेत मिलता है कि ऊँचाई वाले क्षेत्र से एक बड़ा एवलांच नीचे आया, जिसने डाउनस्ट्रीम में पानी और मलबे की अस्थायी रुकावट पैदा की। इसके बाद ग्लेशियर के सामने जमा ढीला और असंगठित मलबा तेज़ बहाव में बह गया। अधिक ढलान होने के कारण मलबा पानी के साथ मिलकर स्लरी जैसा रूप लेता गया और तेज़ी से नीचे की ओर बढ़ा।
जलवायु परिवर्तन की भूमिका
डॉ. मेहता ने स्पष्ट किया कि 1850 के बाद से ग्लेशियरों के लगातार पीछे हटने से बड़ी मात्रा में ढीला मलबा — जिसे मोरेन और रिसेशनल मोरेन कहा जाता है — जमा होता रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते बर्फबारी वाले क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं और ऊँचाई वाले इलाकों में वर्षा बढ़ रही है। यह बारिश ढीले मटेरियल को तेज़ी से नीचे बहा देती है, जिससे कटाव की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। गौरतलब है कि प्रो-ग्लेशियल, पेरी-ग्लेशियल या सुप्रा-ग्लेशियल झीलों में जब पानी का दबाव बढ़ता है और उनका बाँध टूटता है, तो उसे GLOF कहा जाता है — और यह प्रक्रिया अब पहले से अधिक बार देखी जा रही है।
भारत के लिए सबक
डॉ. मेहता ने केदारनाथ, धराली और ऋषिगंगा जैसी पिछली त्रासदियों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में नदी के बिल्कुल किनारे बसावट से बचना ज़रूरी है। उन्होंने ज़ोर दिया कि नदी तल से पर्याप्त ऊँचाई पर बस्तियाँ विकसित करना और इसे डिजास्टर तथा लैंड-यूज़ पॉलिसी का अनिवार्य हिस्सा बनाना अत्यावश्यक है। कोई भी झील — चाहे प्राकृतिक, कृत्रिम या ग्लेशियल — यदि टूटती है तो डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में गंभीर नुकसान हो सकता है।
व्यापक हिमालयी जोखिम
डॉ. मेहता के अनुसार भूटान, पाकिस्तान, चीन और भारत में GLOF से जुड़ी घटनाओं के उदाहरण पहले से मौजूद हैं। हिमालय के उत्तर-पूर्व से उत्तर-पश्चिम तक विभिन्न घाटियों में जोखिम बना हुआ है। हिमालय की जटिल टोपोग्राफी के कारण हर घाटी में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना व्यावहारिक रूप से कठिन है, हालाँकि कुछ संवेदनशील स्थानों पर निगरानी प्रणाली विकसित करने के प्रयास जारी हैं। नेपाल की घटना में चीन या तिब्बत में मानवीय गतिविधियों की भूमिका के सवाल पर उन्होंने कहा कि अभी पर्याप्त शोध उपलब्ध नहीं है, इसलिए कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
विशेषज्ञ की अपील और आगे की राह
डॉ. मेहता ने याद दिलाया कि एशिया की लगभग 1.3 अरब आबादी के लिए ग्लेशियर महत्वपूर्ण जल स्रोत हैं — ग्लेशियर स्वयं खतरा नहीं, बल्कि उनके तेज़ी से बदलने से उत्पन्न परिस्थितियाँ चिंताजनक हैं। उन्होंने आम नागरिकों से वाहनों के धुएँ, धूल, आग और एरोसोल को कम करने, अधिक पेड़ लगाने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की अपील की। हिमालयी आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए वैज्ञानिक निगरानी, बेहतर भूमि-उपयोग नीति, जन-जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण पर एक साथ काम करना ज़रूरी है।