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तिब्बत ग्लेशियर टूटना चीन की साजिश? बाढ़ विशेषज्ञ डॉ. विजय कुमार का बड़ा दावा

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तिब्बत ग्लेशियर टूटना चीन की साजिश? बाढ़ विशेषज्ञ डॉ. विजय कुमार का बड़ा दावा

सारांश

बाढ़ विशेषज्ञ डॉ. विजय कुमार का बड़ा दावा — तिब्बत का ग्लेशियर टूटना चीन की सोची-समझी चाल है, जिससे नेपाल में बाढ़ और अस्थिरता पैदा कर उसे भारत के खिलाफ खड़ा किया जा सके। 2016 में चीन ने खुद हिमालयी हस्तक्षेप स्वीकारा था।

मुख्य बातें

विजय कुमार ने दावा किया कि तिब्बत में ग्लेशियर टूटना चीन के जानबूझकर हस्तक्षेप का परिणाम है, प्राकृतिक घटना नहीं।
उनके अनुसार 2016 में चीन ने स्वयं हिमालयी क्षेत्र में हस्तक्षेप की बात स्वीकार की थी।
चीन पर आरोप है कि उसने तिब्बती नदियों का प्रवाह मोड़कर नेपाल में बाढ़ और अस्थिरता पैदा करने की रणनीति अपनाई।
1954 से इस क्षेत्र में 8 बड़े बाँध प्रस्तावित हैं, जिन पर अमेरिका, चीन और भारत सहित कई देशों की नज़र है।
कुमार ने भारत सरकार से माँग की कि वह इस मुद्दे पर चीन के साथ कूटनीतिक वार्ता करे।
ये दावे विशेषज्ञ की व्यक्तिगत राय हैं; किसी सरकार या अंतरराष्ट्रीय संस्था ने अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

बाढ़ विशेषज्ञ डॉ. विजय कुमार ने 27 अगस्त को भागलपुर में दावा किया कि तिब्बत में हाल ही में हुई ग्लेशियर टूटने की घटना कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि चीन के जानबूझकर किए गए हस्तक्षेप का परिणाम है। उनके अनुसार, चीन ने तिब्बती क्षेत्र में नदियों के प्रवाह को मोड़कर अपने नियंत्रण में कर लिया है, जिससे नेपाल में बाढ़ की स्थिति और भीषण हो गई है।

मुख्य दावा: मानवकृत आपदा

डॉ. विजय कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'ये शुद्ध रूप से मानवकृत घटना है।' उनके अनुसार, ग्लेशियर तभी टूटता है जब उस पर असामान्य दबाव बनाया जाए, और यह दबाव नदी क्षेत्र में बाहरी हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि हिमालय के पुराने इलाकों से आने वाली हवाओं और ग्लेशियरों के बीच का संतुलन बिगड़ने से गंगा और उसकी सहायक नदियों के व्यवहार पर सीधा असर पड़ता है।

विशेषज्ञ ने कहा, 'जो लोग इसे प्राकृतिक घटना मानते हैं, वे या तो इसे समझ नहीं पा रहे हैं, या जानबूझकर ऐसा कह रहे हैं।' उन्होंने कुसहा त्रासदी का भी संदर्भ दिया और बताया कि उस समय भी उन्होंने चीनी हस्तक्षेप की आशंका जताई थी, हालाँकि तब प्रमाण उपलब्ध नहीं थे।

चीन का स्वीकारोक्ति और तिब्बत का संदर्भ

डॉ. कुमार के अनुसार, 2016 में चीन ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसने हिमालयी क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि तिब्बत के स्वतंत्र रहते चीन कभी भारत का सीमावर्ती देश नहीं था — तिब्बत पर कब्जे के बाद ही यह स्थिति बनी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जब यह घटना हुई, उसी समय भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) बीजिंग में सीमा-संबंधी वार्ता के लिए मौजूद थे।

नदियों और बाँधों की राजनीति

डॉ. कुमार ने भारत की अपनी नदी नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि फरक्का बैराज ने गंगा के प्रवाह को बाधित किया और टिहरी बाँध ने ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र को प्रभावित किया — ये दोनों विकास के नाम पर किए गए, लेकिन नदी के स्वाभाविक व्यवहार से छेड़छाड़ का परिणाम भुगतना पड़ रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि 1954 से इस क्षेत्र में 8 बड़े बाँध प्रस्तावित हैं, जिन पर अमेरिका, चीन और अन्य देशों की नज़र है। भारत भी बिजली और सिंचाई के लिए इन परियोजनाओं में रुचि रखता है, लेकिन जन-दबाव के कारण ये अटकी हुई हैं।

नेपाल को अस्थिर करने की रणनीति?

डॉ. कुमार का आरोप है कि चीन की मंशा बाढ़ की स्थिति का राजनीतिक उपयोग करते हुए नेपाल में अस्थिरता पैदा करना है, ताकि नेपाल मजबूर होकर चीन के साथ खड़ा हो और भारत के विरुद्ध रहे। उन्होंने भारत सरकार से माँग की कि वह इस मुद्दे पर चीन के साथ सीधी कूटनीतिक बातचीत करे।

गौरतलब है कि ये दावे एक विशेषज्ञ की व्यक्तिगत राय हैं और इनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। भारत सरकार या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने अभी तक इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भारत-चीन कूटनीतिक स्तर पर इस जल-विवाद को किस दिशा में ले जाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे स्वतंत्र वैज्ञानिक साक्ष्य की कसौटी पर परखना ज़रूरी है — ग्लेशियर विज्ञान एकतरफा 'दबाव से टूटना' सिद्धांत को इतनी सरलता से स्वीकार नहीं करता। यह ऐसे समय में आया है जब भारत-चीन सीमा वार्ता फिर से सक्रिय हुई है और नेपाल में चीनी प्रभाव को लेकर नई दिल्ली की चिंताएँ बढ़ी हैं। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वह यह है कि जल-राजनीति पर भारत की अपनी नीति — फरक्का और टिहरी जैसे हस्तक्षेप — भी पड़ोसी देशों के साथ विश्वसनीयता को कमज़ोर करती है। जब तक भारत सरकार इन दावों की स्वतंत्र जाँच नहीं कराती, ये आरोप कूटनीतिक दबाव से अधिक कुछ नहीं बन पाएँगे।
RashtraPress
27 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. विजय कुमार का तिब्बत ग्लेशियर और चीन पर क्या दावा है?
डॉ. विजय कुमार का दावा है कि तिब्बत में हाल ही में हुई ग्लेशियर टूटने की घटना चीन के जानबूझकर किए गए हस्तक्षेप का नतीजा है, न कि कोई प्राकृतिक आपदा। उनके अनुसार चीन ने नदियों के प्रवाह को मोड़कर नेपाल में बाढ़ की स्थिति पैदा की है।
क्या चीन ने कभी हिमालयी क्षेत्र में हस्तक्षेप स्वीकार किया है?
डॉ. कुमार के अनुसार 2016 में चीन ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि उसने हिमालयी क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है। हालाँकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
नेपाल बाढ़ से भारत को क्या खतरा है?
नेपाल में बाढ़ की स्थिति गंगा और उसकी सहायक नदियों के व्यवहार को सीधे प्रभावित करती है, जिससे बिहार सहित उत्तर भारत के निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। नदियों में बढ़ती गाद इस खतरे को और गंभीर बनाती है।
इस क्षेत्र में प्रस्तावित 8 बड़े बाँध कौन-से हैं और इनमें किसकी रुचि है?
1954 से इस हिमालयी-तिब्बती क्षेत्र में 8 बड़े बाँध प्रस्तावित हैं। डॉ. कुमार के अनुसार इन पर अमेरिका, चीन और भारत सहित कई देशों की नज़र है — भारत बिजली और सिंचाई के लिए, जबकि जन-दबाव के कारण ये परियोजनाएँ अभी तक रुकी हुई हैं।
भारत सरकार को इस मामले में क्या करना चाहिए?
डॉ. विजय कुमार ने माँग की है कि भारत सरकार तिब्बती ग्लेशियर टूटने, पर्यावरण असंतुलन और नदियों के साथ छेड़छाड़ के मुद्दे पर चीन के साथ सीधी कूटनीतिक बातचीत करे। उनका कहना है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और जल संप्रभुता का प्रश्न है।
राष्ट्र प्रेस
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