नेपाल बाढ़ का कारण ग्लेशियर टूटना: डॉ. रंधावा की चेतावनी — हिमाचल के ग्लेशियर भी खतरे में
सारांश
मुख्य बातें
हिमाचल प्रदेश सरकार के आपदा प्रबंधन पर एचआईएमसीओएसटीई के सलाहकार और पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा ने 29 अगस्त को शिमला में स्पष्ट किया कि नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का मूल कारण ग्लेशियर का टूटना है। उनके अनुसार, ग्लेशियर के अग्र भाग के टूटने से अस्थायी अवरोध उत्पन्न हुआ और जब हाइड्रोस्टैटिक दबाव असहनीय हो गया, तो वह अवरोध टूट गया और निचले इलाकों में अचानक भीषण बाढ़ आ गई। उन्होंने आगाह किया कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के चलते हिमाचल प्रदेश समेत समूचे हिमालय क्षेत्र में ऐसी आपदाओं का जोखिम लगातार गहरा होता जा रहा है।
बाढ़ का वैज्ञानिक कारण क्या था
डॉ. रंधावा ने घटनाक्रम की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा, 'नेपाल में जो हुआ उसका मुख्य कारण ग्लेशियर टूटना है। ग्लेशियर का अगला हिस्सा आगे था और धारा ग्लेशियर के पीछे बह रही थी। ग्लेशियर के अंदर पहले से ही काफी बर्फ पिघल रही थी। हो सकता है कि ग्लेशियर का आगे का हिस्सा टूट गया हो, जिससे कुछ समय के लिए रुकावट पैदा हो गई हो, क्योंकि पूरे हिस्से ने आगे के बहाव को रोक दिया था। जब वह हिस्सा आखिरकार टूट गया, तो हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर अचानक बढ़ गया, जिससे रुकावट हट गई और नीचे की तरफ अचानक बाढ़ आ गई, जिसका इतना बड़ा असर हुआ।'
यह घटना हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) की श्रेणी में आती है — एक ऐसी प्रक्रिया जो हिमालयी नदी घाटियों के लिए तेज़ी से बड़ा खतरा बनती जा रही है।
हिमाचल के ग्लेशियरों की स्थिति
डॉ. रंधावा ने 2001 से 2017 के बीच किए गए एक दीर्घकालिक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि लगभग 17 वर्षों में हिमाचल प्रदेश के प्रमुख नदी बेसिनों में ग्लेशियर क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। चिनाब बेसिन में 5.48%, व्यास बेसिन में 7.03%, रावी बेसिन में 4.69% और बासपा बेसिन में 6.52% ग्लेशियर क्षेत्र सिकुड़ चुका है।
उन्होंने कहा कि पिछले 30-32 वर्षों के उपग्रह डेटा-आधारित शोध से यह स्पष्ट है कि ग्लेशियर लगातार पिघलने की अवस्था में हैं। जब ग्लेशियर पिघलता है तो बर्फ और जल तो बह जाता है, किंतु मोरेनिक सामग्री वहीं जमा होती रहती है और धीरे-धीरे एक झील का रूप ले लेती है — जिसे मोरेन-बांधित हिमनद झील (MDGL) कहते हैं।
बर्फबारी का बदलता पैटर्न और नई चुनौतियाँ
डॉ. रंधावा ने एक और गंभीर प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाया — हिमाचल में बर्फबारी का मौसमी चक्र बदल रहा है। सर्दियों की बजाय अब मार्च-अप्रैल में बर्फ पड़ने लगी है, जिससे ग्लेशियरों का द्रव्यमान संतुलन बिगड़ रहा है। यह असंतुलन ग्लेशियर के आगे और बीच में बनने वाली दोनों प्रकार की MDGL झीलों को अधिक अस्थिर बनाता है, जो किसी भी समय बाढ़ का कारण बन सकती हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब हिमालय क्षेत्र को भूकंपीय दृष्टि से भी अधिक संवेदनशील माना जाने लगा है। उन्होंने बताया कि हिमालय क्षेत्र को पहले भूकंपीय जोन 4-5 में रखा जाता था, किंतु अब इसे जोन 6 में वर्गीकृत किया जा चुका है, जो बड़े भूकंपों की उच्च संभावना दर्शाता है।
निगरानी तंत्र और सतलुज की विशेष चुनौती
हिमाचल प्रदेश में व्यास, रावी, चिनाब, यमुना और सतलुज — पाँच प्रमुख नदी बेसिन हैं। जहाँ व्यास, रावी और चिनाब का उद्गम हिमाचल में है, वहीं सतलुज का उद्गम चीन में है, जो निगरानी को और जटिल बनाता है।
डॉ. रंधावा ने बताया कि 1993 के आसपास उपग्रह डेटा के माध्यम से हिमाचल और चीन के बेसिन में 32 झीलें चिह्नित की गई थीं। वर्तमान में लिस्ट-4 डेटा उपलब्ध है और प्रत्येक वर्ष पूरे बेसिन की मैपिंग की जाती है। सतलुज बेसिन की विशेष निगरानी अप्रैल से नवंबर तक हर वर्ष की जाती है ताकि किसी भी असामान्य गतिविधि को समय रहते पकड़ा जा सके।
विशेषज्ञ की चेतावनी का व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि नेपाल में आई यह बाढ़ हिमालयी क्षेत्र में GLOF की बढ़ती घटनाओं की श्रृंखला में एक और कड़ी है। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि के साथ हिमालय के ग्लेशियर वैश्विक औसत से दोगुनी गति से पिघल रहे हैं। डॉ. रंधावा की यह चेतावनी केवल नेपाल तक सीमित नहीं है — हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के लाखों निवासी भी इसी जोखिम के दायरे में हैं।
आने वाले वर्षों में ग्लेशियर निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन क्षमता को और मज़बूत किए बिना, हिमालयी राज्यों की तैयारी अधूरी रहेगी।