नेपाल बाढ़ में 1,114 मौतें, PM बालेंद्र शाह ने हिमालयी जलवायु संकट पर विश्व से माँगा ठोस जवाब
सारांश
मुख्य बातें
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने 2 सितंबर 2026 को काठमांडू में प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों पर वैश्विक समुदाय से ठोस और साझा कार्रवाई की माँग की। विनाशकारी फ्लैश फ्लड के आठ दिन बाद राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के अनुसार मृतकों की संख्या 1,114 तक पहुँच चुकी है और करीब 3,916 लोग अभी भी लापता हैं।
आपदा का कारण और विनाश का दायरा
विशेषज्ञों के अनुसार, नेपाल-चीन सीमा के निकट भोटेकोशी नदी की सहायक नदी लेंगडे खोला में हिमस्खलन के कारण एक प्राकृतिक जलावरोध बन गया था। पानी के भारी दबाव से यह प्राकृतिक बाँध अचानक टूट गया और विशाल मात्रा में पानी, कीचड़ तथा मलबा तेज़ी से निचले इलाकों की ओर बढ़ा। बाढ़ आगे त्रिशूली नदी तक फैली और रास्ते में बस्तियों तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को भारी क्षति पहुँची।
यह घटना हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे की ताज़ा और गंभीर मिसाल है। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर में तेज़ी आई है, जिससे इस तरह की आपदाओं की आशंका कई गुना बढ़ गई है।
संसद में PM शाह का संबोधन
प्रधानमंत्री शाह ने प्रतिनिधि सभा में कहा, 'जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अचानक सामने आई इस बड़ी आपदा ने हमें चौबीसों घंटे नुकसान को नियंत्रित करने में जुटे रहने को मजबूर कर दिया है। साथ ही हमारे मन में एक गहरा सवाल भी उठा है कि आखिर यह आपदा हमारे सामने कैसे आई?'
उन्होंने आगे कहा, 'जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है। इसके प्रभावों से निपटना और उन्हें कम करने के प्रयास पूरी वैश्विक समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।' शाह ने स्पष्ट किया कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि मानव जीवन, बुनियादी ढाँचे और भविष्य की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।
प्रारंभिक चेतावनी और बचाव अभियान की चुनौतियाँ
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी पहुँचाने में सरकार की भूमिका पर उठे सवालों का जवाब देते हुए शाह ने कहा, 'जैसे ही हमें जानकारी मिली कि बाढ़ आ रही है, हमारे सुरक्षा कर्मियों को लोगों को सतर्क करने के लिए तैनात किया गया। हालाँकि, वे खुद इस अभियान के दौरान लापता हो गए।'
प्रधानमंत्री ने बताया कि भारी कीचड़ और मलबे के कारण शुरुआत में खुदाई करने वाली मशीनों को घटनास्थल तक पहुँचाना संभव नहीं था। सेना और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों के लिए भी सुरक्षित और स्थिर ज़मीन उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने कहा कि बचावकर्मियों ने जहाँ तक संभव हुआ, रेंगकर प्रभावित इलाकों तक पहुँचने का प्रयास किया। शाह ने इसे 'असाधारण स्थिति' बताया।
अंतरराष्ट्रीय सहायता और पड़ोसी देशों की भूमिका
कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि नेपाल सरकार अंतरराष्ट्रीय सहायता स्वीकार करने को लेकर अनिच्छुक थी। शाह ने इसका खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि बड़े पैमाने की आपदा के दौरान अंतरराष्ट्रीय सहायता को अस्वीकार करने की सरकार की कोई नीति नहीं रही है।
शाह ने भारत और चीन की सहायता का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि दोनों पड़ोसी देशों ने तकनीकी विशेषज्ञ भेजे, जिन्होंने आपदा के पहले दिन से ही प्रभावित इलाकों का हवाई और तकनीकी जायज़ा लेना शुरू कर दिया था। जब परिस्थितियाँ कुछ अनुकूल हुईं, तभी प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँचना संभव हो सका।
वैश्विक समर्थन और आगे की राह
प्रधानमंत्री शाह ने राहत और बचाव में सहयोग के लिए भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश का आभार जताया। इसके अलावा एशियाई विकास बैंक (ADB), विश्व बैंक, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र ने भी नेपाल की आपदा प्रतिक्रिया में सहयोग दिया।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक जलवायु वार्ताओं में छोटे और विकासशील देशों की माँग है कि जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक रूप से ज़िम्मेदार बड़े औद्योगिक देश नुकसान और क्षति (Loss and Damage) के मुआवज़े में ठोस योगदान दें। नेपाल की यह त्रासदी उस बहस को और तीखा करने वाली है। आने वाले हफ्तों में लापता लोगों की तलाश और पुनर्वास कार्यक्रम नेपाल सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता बने रहेंगे।