पाकिस्तान की फितरत नहीं बदलेगी: रक्षा विशेषज्ञ अनिल गौर, अफगान शरणार्थियों को निकालना गलत
सारांश
मुख्य बातें
रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन (सेवानिवृत्त) अनिल गौर ने जम्मू में अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान की प्रकृति कभी नहीं बदलेगी — 1947, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के बाद भी उसने ऑपरेशन टॉपैक और 'हजार कट्स' जैसी रणनीतियों के ज़रिये कश्मीर को अस्थिर करने की कोशिशें जारी रखीं। उन्होंने साथ ही भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के समक्ष अफगान शरणार्थियों का मुद्दा उठाए जाने का समर्थन किया।
पाकिस्तान की ऐतिहासिक साजिशें और कश्मीर
कैप्टन गौर ने कहा, 'पाकिस्तान की फितरत नहीं बदलेगी। सब कुछ करने के बावजूद पहलगाम हमला हुआ और हमने पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाया। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई का यही रवैया बन गया है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान और उसके नेता हमेशा से कश्मीर को हथियाना चाहते रहे हैं।
रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, इसी मंशा के साथ पाकिस्तान ने 1947 में ऑपरेशन गुलमर्ग लॉन्च किया था और अपने नियमित सैनिकों को कबाइलियों के वेश में कश्मीर भेजा था। 'वे कबाइली नहीं थे, बल्कि पाकिस्तानी सेना के नियमित जवान थे' — यह बात उन्होंने रेखांकित की। उसी समय से पाकिस्तान अपने नागरिकों में 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' का झूठा नारा फैलाता आया है।
पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता
कैप्टन गौर ने कहा कि कश्मीर तो पाकिस्तान बन नहीं पाया, बल्कि अब खुद पाकिस्तान विभाजन की कगार पर दिखता है। उनके अनुसार, बलूचिस्तान ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी है, खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान की पार्टी ने एक प्रकार का विरोध आंदोलन छेड़ा हुआ है, और सिंध के लोग पंजाबी वर्चस्व को लेकर असंतोष व्यक्त करते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पहले से ही नाज़ुक बनी हुई है। गौरतलब है कि ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान की धरती पर पाया जाना उसके दोहरे रवैये का सबसे बड़ा उदाहरण है, जैसा कैप्टन गौर ने याद दिलाया।
भारत की रणनीति: आत्मनिर्भरता और मज़बूती
रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि भारत का गृह मंत्रालय पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर लगातार नज़र रखता है। उनके अनुसार, जो देश 'मैं ना मानूं' की जिद पर अड़ा हो, उसे समझाना बेकार है। इसलिए भारत को अपना ध्यान आत्मशक्ति बढ़ाने पर केंद्रित रखना चाहिए — 'हमें खुद को मजबूत बनाना है और समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा।'
अफगान शरणार्थियों पर पाकिस्तान का रवैया
कैप्टन गौर ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के समक्ष भारत द्वारा अफगान शरणार्थियों का मुद्दा उठाए जाने की सराहना की। उनके अनुसार, तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान से 40 से 50 लाख लोग पाकिस्तान में शरण लेने पहुँचे थे। इन्हें अचानक नोटिस देकर वापस भेजे जाने की पाकिस्तान की कार्रवाई मानवीय दृष्टि से गलत है।
कैप्टन गौर ने तर्क दिया कि ये शरणार्थी उसी क्षेत्र के मुसलमान हैं और पाकिस्तान को इन्हें 'बाहरी' नहीं मानना चाहिए। इन लोगों ने वर्षों से पाकिस्तान में रहकर अपना जीवन बसाया था, ऐसे में उन्हें जबरन निकालना न केवल अमानवीय है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विरुद्ध भी है।
आने वाले समय में भारत की यह कूटनीतिक पहल पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।