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पाकिस्तान की फितरत नहीं बदलेगी: रक्षा विशेषज्ञ अनिल गौर, अफगान शरणार्थियों को निकालना गलत

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पाकिस्तान की फितरत नहीं बदलेगी: रक्षा विशेषज्ञ अनिल गौर, अफगान शरणार्थियों को निकालना गलत

सारांश

रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर ने साफ कहा — पाकिस्तान 1947 से आज तक नहीं बदला, और बदलेगा भी नहीं। पहलगाम से ऑपरेशन गुलमर्ग तक की कड़ी जोड़ते हुए उन्होंने भारत को आत्मशक्ति बढ़ाने की सलाह दी और 40-50 लाख अफगान शरणार्थियों को पाकिस्तान द्वारा निकाले जाने को अमानवीय करार दिया।

मुख्य बातें

रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन (सेवानिवृत्त) अनिल गौर ने जम्मू में कहा कि पाकिस्तान की प्रकृति 1947 से आज तक नहीं बदली है।
उन्होंने ऑपरेशन गुलमर्ग (1947) , ऑपरेशन टॉपैक और 'हजार कट्स' रणनीति का उल्लेख कर पाकिस्तान की कश्मीर-विरोधी साजिशों का ऐतिहासिक विवरण दिया।
बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा और खैबर पख्तूनख्वा व सिंध में असंतोष को पाकिस्तान के विखंडन के संकेत बताया।
भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति में अफगान शरणार्थियों का मुद्दा उठाए जाने का समर्थन किया।
पाकिस्तान में शरण लेने वाले 40 से 50 लाख अफगान शरणार्थियों को जबरन निकाले जाने को अमानवीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों के विरुद्ध बताया।

रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन (सेवानिवृत्त) अनिल गौर ने जम्मू में अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान की प्रकृति कभी नहीं बदलेगी — 1947, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के बाद भी उसने ऑपरेशन टॉपैक और 'हजार कट्स' जैसी रणनीतियों के ज़रिये कश्मीर को अस्थिर करने की कोशिशें जारी रखीं। उन्होंने साथ ही भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के समक्ष अफगान शरणार्थियों का मुद्दा उठाए जाने का समर्थन किया।

पाकिस्तान की ऐतिहासिक साजिशें और कश्मीर

कैप्टन गौर ने कहा, 'पाकिस्तान की फितरत नहीं बदलेगी। सब कुछ करने के बावजूद पहलगाम हमला हुआ और हमने पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाया। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई का यही रवैया बन गया है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान और उसके नेता हमेशा से कश्मीर को हथियाना चाहते रहे हैं।

रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, इसी मंशा के साथ पाकिस्तान ने 1947 में ऑपरेशन गुलमर्ग लॉन्च किया था और अपने नियमित सैनिकों को कबाइलियों के वेश में कश्मीर भेजा था। 'वे कबाइली नहीं थे, बल्कि पाकिस्तानी सेना के नियमित जवान थे' — यह बात उन्होंने रेखांकित की। उसी समय से पाकिस्तान अपने नागरिकों में 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' का झूठा नारा फैलाता आया है।

पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता

कैप्टन गौर ने कहा कि कश्मीर तो पाकिस्तान बन नहीं पाया, बल्कि अब खुद पाकिस्तान विभाजन की कगार पर दिखता है। उनके अनुसार, बलूचिस्तान ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी है, खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान की पार्टी ने एक प्रकार का विरोध आंदोलन छेड़ा हुआ है, और सिंध के लोग पंजाबी वर्चस्व को लेकर असंतोष व्यक्त करते हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पहले से ही नाज़ुक बनी हुई है। गौरतलब है कि ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान की धरती पर पाया जाना उसके दोहरे रवैये का सबसे बड़ा उदाहरण है, जैसा कैप्टन गौर ने याद दिलाया।

भारत की रणनीति: आत्मनिर्भरता और मज़बूती

रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि भारत का गृह मंत्रालय पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर लगातार नज़र रखता है। उनके अनुसार, जो देश 'मैं ना मानूं' की जिद पर अड़ा हो, उसे समझाना बेकार है। इसलिए भारत को अपना ध्यान आत्मशक्ति बढ़ाने पर केंद्रित रखना चाहिए — 'हमें खुद को मजबूत बनाना है और समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा।'

अफगान शरणार्थियों पर पाकिस्तान का रवैया

कैप्टन गौर ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के समक्ष भारत द्वारा अफगान शरणार्थियों का मुद्दा उठाए जाने की सराहना की। उनके अनुसार, तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान से 40 से 50 लाख लोग पाकिस्तान में शरण लेने पहुँचे थे। इन्हें अचानक नोटिस देकर वापस भेजे जाने की पाकिस्तान की कार्रवाई मानवीय दृष्टि से गलत है।

कैप्टन गौर ने तर्क दिया कि ये शरणार्थी उसी क्षेत्र के मुसलमान हैं और पाकिस्तान को इन्हें 'बाहरी' नहीं मानना चाहिए। इन लोगों ने वर्षों से पाकिस्तान में रहकर अपना जीवन बसाया था, ऐसे में उन्हें जबरन निकालना न केवल अमानवीय है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विरुद्ध भी है।

आने वाले समय में भारत की यह कूटनीतिक पहल पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनका संदर्भ महत्वपूर्ण है — पहलगाम हमले के बाद जब भारत-पाकिस्तान तनाव फिर से चर्चा में है, ऐसे में एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी का यह विश्लेषण सार्वजनिक विमर्श को दिशा देता है। हालाँकि, बलूचिस्तान की 'स्वतंत्रता की घोषणा' जैसे दावे अतिरंजित लग सकते हैं और इन्हें सत्यापित तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करने में सावधानी ज़रूरी है। अफगान शरणार्थियों के मुद्दे पर भारत का संयुक्त राष्ट्र मंच का उपयोग एक सुविचारित कूटनीतिक कदम है जो पाकिस्तान को मानवाधिकार के मोर्चे पर घेरता है।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कैप्टन अनिल गौर ने पाकिस्तान के बारे में क्या कहा?
कैप्टन (सेवानिवृत्त) अनिल गौर ने कहा कि पाकिस्तान की फितरत 1947 से आज तक नहीं बदली है। उनके अनुसार, पाकिस्तान ने ऑपरेशन गुलमर्ग, ऑपरेशन टॉपैक और 'हजार कट्स' जैसी रणनीतियों से कश्मीर को अस्थिर करने की लगातार कोशिश की है।
ऑपरेशन गुलमर्ग क्या था?
ऑपरेशन गुलमर्ग 1947 में पाकिस्तान द्वारा शुरू किया गया अभियान था, जिसमें नियमित पाकिस्तानी सैनिकों को कबाइलियों के वेश में कश्मीर भेजा गया था। कैप्टन गौर के अनुसार, यह पाकिस्तान की कश्मीर हड़पने की शुरुआती कोशिश थी।
पाकिस्तान अफगान शरणार्थियों को क्यों निकाल रहा है?
तालिबान शासन के बाद 40 से 50 लाख अफगान नागरिक पाकिस्तान में शरण ले चुके थे। पाकिस्तान ने अचानक इन्हें नोटिस देकर वापस जाने को कहा, जिसे रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन गौर ने अमानवीय और गलत बताया है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अफगान शरणार्थियों का मुद्दा क्यों उठाया?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के समक्ष यह मुद्दा उठाया ताकि पाकिस्तान द्वारा अफगान शरणार्थियों के साथ किए जा रहे व्यवहार पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकृष्ट हो सके। कैप्टन गौर ने इस कदम का समर्थन किया और कहा कि ये शरणार्थी उसी क्षेत्र के मुसलमान हैं।
पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति कैसी है?
कैप्टन गौर के अनुसार, बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की माँग, खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान की पार्टी का विरोध आंदोलन और सिंध में पंजाबी वर्चस्व के खिलाफ असंतोष — ये सभी पाकिस्तान की बढ़ती आंतरिक अस्थिरता के संकेत हैं।
राष्ट्र प्रेस
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