पाकिस्तान का 'कठोर शासन' बलूचिस्तान-KPK में उग्रवाद बढ़ा रहा है, POK में विरोध जारी: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
इस्लामाबाद में जारी इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का 'कठोर शासन' दृष्टिकोण बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (KPK) प्रांतों में उग्रवाद को लगातार हवा दे रहा है, राजनीतिक विभाजन को गहरा कर रहा है और देशव्यापी अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में जारी विरोध प्रदर्शन पाकिस्तान की आंतरिक उथल-पुथल की गहराई को उजागर करते हैं, जिसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय सद्भावना से कम नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में 2023 में हुए विद्रोही हमलों का 93 प्रतिशत हिस्सा था, जो 2024 और 2025 में बढ़कर 95 प्रतिशत हो गया। यह आँकड़ा स्पष्ट करता है कि इन दोनों प्रांतों में सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि 2025-26 में पाकिस्तान की आर्थिक विकास दर मात्र 3.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
आर्थिक संकट और ऋण का बोझ
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा पाकिस्तान को 7 अरब अमेरिकी डॉलर का राहत पैकेज दिया गया है, फिर भी देश का सार्वजनिक ऋण सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 68.5 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे में देश को तत्काल ऐसे वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता है जो आंतरिक संघर्षों को सुलझाने और दीर्घकालिक राजनीतिक व आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में सक्षम हो।
क्षेत्रीय अशांति और नागरिक अलगाव
रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और POK — तीनों क्षेत्र राजनीतिक अशांति, हिंसक झड़पों और नागरिकों के बीच बढ़ते अलगाव से जूझ रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों के कारण भले ही क्षेत्र-दर-क्षेत्र भिन्न हों, लेकिन कुछ साझा मुद्दे हैं — संघीय सरकार द्वारा अत्यधिक केंद्रीकरण, गहरी आर्थिक असमानता और राजनीतिक हाशियाकरण। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि नागरिक सरकार ने इन संघर्षों को राजनीतिक रूप से हल करने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट गई है।
सेना की 'सुरक्षा-केंद्रित' प्रतिक्रिया पर सवाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी सशस्त्र बल इन संघर्षों को राजद्रोह या कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में चित्रित करते हैं और प्रदर्शनकारियों पर बाहरी शक्तियों के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए उनकी राजनीतिक वैधता को नकारते हैं। रिपोर्ट के अनुसार यह अत्यधिक 'सुरक्षा-केंद्रित' प्रतिक्रिया लोकतांत्रिक माध्यमों से शिकायतों के समाधान की संभावनाओं को कमज़ोर करती है और अविश्वास, अलगाव तथा टकराव के एक दुष्चक्र को बढ़ावा देती है।
अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता पर असर
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि विदेशों में संभावित शांति मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की विश्वसनीयता अंततः घरेलू स्तर पर शांति और राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगी। गौरतलब है कि यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान IMF की शर्तों के तहत कठिन आर्थिक सुधारों से गुज़र रहा है और सियासी उठापटक थमने का नाम नहीं ले रही।