पाकिस्तान ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026: 122 देशों में 106वाँ स्थान, चेतावनियों की अनदेखी से बढ़ा भुखमरी संकट
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में भुखमरी और कुपोषण का संकट दशकों की नीतिगत उदासीनता, चेतावनियों की अनदेखी और कठिन फैसलों को टालते रहने की प्रवृत्ति का परिणाम है — यह निष्कर्ष द फ्राइडे टाइम्स में प्रकाशित एक विस्तृत विश्लेषण में सामने आया है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2026 में पाकिस्तान 25.5 के स्कोर के साथ 122 देशों में 106वें स्थान पर रहा, जो उसे दक्षिण एशिया का दूसरा सबसे बुरी तरह प्रभावित देश बनाता है।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026 में पाकिस्तान की स्थिति
GHI रैंकिंग में अफगानिस्तान 28.6 के स्कोर के साथ पाकिस्तान से भी नीचे रहा, लेकिन यह तथ्य पाकिस्तान के लिए राहत की बात नहीं है। इंडेक्स चार संकेतकों पर आधारित है: अल्पपोषण, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में उम्र के अनुपात में कम लंबाई (Stunting), लंबाई के अनुपात में कम वजन (Wasting), और 5 वर्ष से कम आयु में बाल मृत्यु दर।
आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान की 16.1 प्रतिशत आबादी कुपोषित है। 5 वर्ष से कम आयु के 33.6 प्रतिशत बच्चे Stunting की समस्या से प्रभावित हैं, जबकि 9.8 प्रतिशत बच्चे Wasting से जूझ रहे हैं। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि पाँच वर्ष की आयु पूरी करने से पहले 5.6 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु हो जाती है।
चेतावनियाँ थीं, कार्रवाई नहीं हुई
द फ्राइडे टाइम्स के विश्लेषण में लेखक जिशान अहमद सिद्दीकी ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान में समस्याओं के आकलन और चेतावनियों की कभी कमी नहीं रही। उन्होंने लिखा, 'शोधकर्ता रिपोर्ट तैयार करते हैं, अंतरराष्ट्रीय संगठन उन्हें प्रकाशित करते हैं, विकास एजेंसियाँ वित्तीय सहायता देती हैं और सरकारी संस्थान भी इन निष्कर्षों को स्वीकार करते हैं — लेकिन समस्या की पहचान और उस पर कार्रवाई के बीच जरूरी तत्परता खत्म हो जाती है।'
यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण एशिया में खाद्य सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है और पाकिस्तान स्वयं गंभीर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। सिद्दीकी के अनुसार, 'देश अक्सर समस्याओं को समझने में विफल नहीं होते, बल्कि दशकों तक उन्हीं समस्याओं का विश्लेषण करते रहते हैं और समाधान टालते जाते हैं।'
संकट की जड़ें: शासन और जवाबदेही की विफलता
रिपोर्ट के अनुसार, गरीबी, खराब शिक्षा परिणाम, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, बाल श्रम, खाद्य असुरक्षा, पर्यावरणीय गिरावट और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ पाकिस्तान में अचानक पैदा नहीं हुईं। गौरतलब है कि इस दौरान सरकारें बदलती रहीं, समितियाँ गठित होती रहीं और पहले से पहचानी जा चुकी समस्याओं पर नई-नई रिपोर्टें तैयार होती रहीं — परंतु ठोस कार्यान्वयन नदारद रहा।
सिद्दीकी ने कहा कि पाकिस्तान में भुखमरी का संकट केवल भोजन की कमी का मामला नहीं, बल्कि यह शासन व्यवस्था, जवाबदेही और नीतिगत प्राथमिकताओं से भी जुड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुश्किल मुद्दों पर चर्चा से बचने की प्रवृत्ति और तब तक फैसले टालने की आदत — जब तक हालात कोई दूसरा विकल्प न छोड़ दें — इस संकट को और गहरा करती रही है।
आम जनता पर असर
कुपोषण के ये आँकड़े सामाजिक विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं। Stunting से प्रभावित बच्चों की संज्ञानात्मक क्षमता और उत्पादकता पर असर पड़ता है, जो आगे चलकर मानव पूँजी निर्माण को कमज़ोर करता है। 16.1 प्रतिशत की कुपोषण दर का सीधा अर्थ है कि पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी प्रतिदिन आवश्यक कैलोरी से वंचित है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट का बोझ सबसे अधिक ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है, जहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा जाल पहले से ही कमजोर हैं।
क्या होगा आगे
रिपोर्ट में स्पष्ट संकेत है कि जब तक पाकिस्तान में नीति-निर्माण और क्रियान्वयन के बीच की खाई नहीं पाटी जाती, तब तक GHI रैंकिंग में सुधार की उम्मीद कम है। सिद्दीकी ने चेताया कि यह समस्या अब इतनी बड़ी हो गई है कि इसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं रहा — और अब देरी का मूल्य पहले से कहीं अधिक होगा।