8 अगस्त 2026
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पाकिस्तान की सैन्य ताकत पर सस्ती चीनी ड्रोन तकनीक की निर्भरता का प्रभाव

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पाकिस्तान की सैन्य ताकत पर सस्ती चीनी ड्रोन तकनीक की निर्भरता का प्रभाव

सारांश

कोलंबो, 21 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं पर सस्ती चीनी ड्रोन तकनीक की निर्भरता बढ़ रही है। यह रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों के उन्नत रक्षा बाजार से बाहर होने के कारण पाकिस्तान को मजबूरी में चीन की ओर देखना पड़ा।

मुख्य बातें

सस्ती चीनी ड्रोन तकनीक पर निर्भरता पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को सीमित कर रही है।
पश्चिमी देशों के उन्नत रक्षा बाजार से बाहर होने के कारण पाकिस्तान को मजबूरी में चीन का रुख करना पड़ा।
चीन के ड्रोन की कीमतें अमेरिकी ड्रोन की तुलना में काफी कम हैं।
पाकिस्तान का ड्रोन कार्यक्रम गहराई से जुड़ा है, जिससे बदलाव मुश्किल हैं।
सस्ता होने के बावजूद, चीनी ड्रोन की प्रदर्शन सीमाएं हैं।

कोलंबो, 21 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं पर सस्ती चीनी ड्रोन प्रौद्योगिकी की बढ़ती निर्भरता का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। श्रीलंका के समाचार पत्र डेली मिरर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी देशों के उन्नत रक्षा बाजार से बाहर होने के कारण पाकिस्तान ने मजबूरी में चीन के विकल्पों की ओर रुख किया है, जो कि केवल एक रणनीतिक साझेदारी नहीं है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका के अत्याधुनिक ड्रोन, जैसे एमक्यू-1 प्रीडेटर और एमक्यू-9 रीपर, तकनीकी दृष्टि से काफी उन्नत हैं, लेकिन वॉशिंगटन इनकी बिक्री पर सख्त प्रतिबंध लगाता है, विशेषकर चीन के निकटवर्ती देशों के लिए। इस कारण पाकिस्तान के पास सीमित विकल्प हैं, जिससे उसे चीन पर निर्भर होना पड़ा है।

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने ड्रोन जैसे विंग लूंग II को सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी कीमत लगभग १-२ मिलियन डॉलर है, जबकि एमक्यू-9 रीपर की कीमत लगभग ३० मिलियन डॉलर तक पहुंचती है। हालांकि, इस मूल्य अंतर के पीछे प्रदर्शन में भी बड़ा अंतर है, जिसे अक्सर प्रचार में नहीं बताया जाता।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पाकिस्तान का उपयोग में लाया जाने वाला सीएच-4बी ड्रोन एमक्यू-9 रीपर के समान दिखता है, लेकिन इसकी क्षमताएं सीमित हैं। वहीं, चीन का उन्नत मॉडल सीएच-5 भी इंजन क्षमता में पीछे है, जिससे इसकी अधिकतम उड़ान ऊँचाई लगभग ९ किमी तक ही सीमित रहती है, जबकि रीपर १२-१५ किमी तक उड़ान भर सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान का ड्रोन कार्यक्रम अब संस्थागत रूप से इतना गहराई से जुड़ चुका है कि इसे बदलना आसान नहीं होगा, भले ही भविष्य में चीन-पाकिस्तान संबंधों में कोई बदलाव आए। लेकिन, वास्तविक क्षमता उतनी प्रभावशाली नहीं है, जितनी इसे प्रचारित किया जाता है।

अंत में, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कम कीमत के पीछे कई कारण हैं; रखरखाव की समस्याएं और युद्ध में होने वाले नुकसान पहले से दर्ज हैं, जो इसकी सीमाओं को उजागर करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पाकिस्तान ने चीनी ड्रोन पर निर्भरता क्यों बढ़ाई?
पाकिस्तान ने पश्चिमी देशों के उन्नत रक्षा बाजार से बाहर होने के कारण मजबूरी में चीनी ड्रोन तकनीक की ओर रुख किया।
क्या चीनी ड्रोन की कीमतें कम हैं?
हां, चीनी ड्रोन जैसे विंग लूंग II की कीमत १-२ मिलियन डॉलर है, जो अमेरिकी ड्रोन की तुलना में काफी कम है।
क्या पाकिस्तान के ड्रोन कार्यक्रम में कोई सुधार संभव है?
वर्तमान में, पाकिस्तान का ड्रोन कार्यक्रम इतनी गहराई से जुड़ चुका है कि इसे बदलना आसान नहीं होगा।
क्या सस्ती ड्रोन तकनीक की सीमाएं हैं?
हां, सस्ती ड्रोन तकनीक में रखरखाव की समस्याएं और युद्ध में नुकसान की समस्याएं शामिल हैं।
पाकिस्तान के पास ड्रोन की कौन सी तकनीकें हैं?
पाकिस्तान के पास सीएच-4बी जैसे ड्रोन हैं, लेकिन उनकी क्षमताएं सीमित हैं।
राष्ट्र प्रेस
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