सैम पित्रोदा ने ममदानी की आरएसएस आलोचना को बताया 'कुछ हद तक सच', अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा ने न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर की गई आलोचना का खुलकर समर्थन किया है। 28 अगस्त को दिए एक विशेष साक्षात्कार में पित्रोदा ने कहा कि ममदानी की बातों में 'कुछ सच्चाई' है, जो भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर उठने वाली व्यापक चिंताओं को रेखांकित करती है।
ममदानी की टिप्पणी पर पित्रोदा का रुख
पित्रोदा ने स्पष्ट किया कि मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में आयोजित कार्यक्रम एक निजी आयोजन था और हर संगठन को ऐसे कार्यक्रम करने का अधिकार है। उन्होंने कहा, 'मैं जानता हूं कि न्यूयॉर्क के मेयर ने अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन वह एक निजी कार्यक्रम था। हर किसी को अपना निजी कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार है। इसमें कोई समस्या नहीं है।' हालांकि जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या वे ममदानी की आरएसएस संबंधी राय से सहमत हैं, तो उन्होंने कहा कि ममदानी के विचार उनके निजी हैं — और इसके बाद भारत की धार्मिक-सामाजिक स्थिति पर अपनी राय साझा की।
धर्मनिरपेक्षता और संस्थापक विरासत पर ज़ोर
पित्रोदा ने कहा, 'मेरा मानना है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। मैं ऐसे भारत में विश्वास करता हूं जहां धर्म, जाति, भाषा या राज्य के आधार पर कोई भेदभाव न हो।' उन्होंने संविधान निर्माताओं की कल्पना का हवाला देते हुए कहा कि वे 'समान अधिकारों, सत्य, विश्वास, प्रेम और न्याय में भरोसा करते हैं, न कि नफरत में।'
पित्रोदा ने अपने बचपन के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया, 'मेरा जन्म 1942 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। मैं एक छोटे से आदिवासी गांव में पला-बढ़ा। हमारे सामने मुस्लिम परिवार रहता था, बाईं तरफ जैन परिवार था, दाईं तरफ सिख परिवार था और पीछे आदिवासी ओड़िया समुदाय के लोग रहते थे। हम सब शांति और सद्भाव के साथ रहते थे। कोई संघर्ष नहीं था।'
अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और आरएसएस पर आरोप
पित्रोदा ने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। उन्होंने कहा, 'आप किसी आम मुस्लिम या ईसाई से पूछिए कि पिछले 15 वर्षों में उन्होंने कैसा महसूस किया है, उनके चर्चों और समुदायों के साथ क्या हुआ है, वे आपको खुद बताएंगे।' उन्होंने शिक्षा और अन्य सार्वजनिक संस्थानों पर आरएसएस के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए।
पित्रोदा ने यह भी आरोप लगाया कि आरएसएस के बयानों और उसके कामकाज के बीच अंतर है। उन्होंने कहा, 'उनकी बातें कुछ और कहती हैं और उनके काम कुछ और। मेरे लिए कर्म शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी मोहन भागवत से कभी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई, हालांकि वे कुछ आरएसएस सदस्यों को निजी तौर पर जानते हैं।
विविधता का सम्मान, हिंसा पर आपत्ति
पित्रोदा ने कहा, 'मैं उनका सम्मान करता हूं। मैं विविधता का सम्मान करता हूं। लेकिन जब बात हिंसा तक पहुंच जाती है, तब मुझे समस्या होती है। जब नफरत बढ़ती है, तब मुझे समस्या होती है।' उन्होंने आरएसएस सहित सभी भारतीय संगठनों से अपील की कि वे संस्थापक नेताओं के उस मूल विचार की ओर लौटें जिसमें 'भारत सबका है — हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों, दलितों और हर समुदाय का।'
आरएसएस: एक परिचय
गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी। संगठन ने 2025 में अपना 100वां वर्ष पूरा किया। आरएसएस स्वयं को एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बताता है, जो राष्ट्र सेवा और चरित्र निर्माण के लिए काम करता है। पित्रोदा की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत-अमेरिका संबंधों और भारतीय प्रवासी समुदाय की राजनीतिक सक्रियता पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान बढ़ा है।