28 अगस्त 2026
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सैम पित्रोदा ने ममदानी की आरएसएस आलोचना को बताया 'कुछ हद तक सच', अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर उठाए सवाल

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सैम पित्रोदा ने ममदानी की आरएसएस आलोचना को बताया 'कुछ हद तक सच', अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर उठाए सवाल

सारांश

कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने न्यूयॉर्क में दिए साक्षात्कार में ममदानी की आरएसएस आलोचना को 'कुछ हद तक सच' बताया और पिछले 15 वर्षों में मुसलमानों व ईसाइयों में बढ़ती असुरक्षा का आरोप लगाया। यह बयान भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान और संस्थाओं पर राजनीतिक बहस को फिर केंद्र में ले आया है।

मुख्य बातें

सैम पित्रोदा ने 28 अगस्त को न्यूयॉर्क में दिए साक्षात्कार में ममदानी की आरएसएस आलोचना को 'कुछ सच्चाई' वाली बताया।
पित्रोदा ने स्वीकार किया कि मोहन भागवत का न्यूयॉर्क कार्यक्रम निजी था और हर संगठन को ऐसे आयोजन का अधिकार है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है।
पित्रोदा ने शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों पर आरएसएस के प्रभाव को लेकर सवाल उठाए।
आरएसएस की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी; संगठन ने 2025 में अपना 100वां वर्ष पूरा किया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा ने न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर की गई आलोचना का खुलकर समर्थन किया है। 28 अगस्त को दिए एक विशेष साक्षात्कार में पित्रोदा ने कहा कि ममदानी की बातों में 'कुछ सच्चाई' है, जो भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर उठने वाली व्यापक चिंताओं को रेखांकित करती है।

ममदानी की टिप्पणी पर पित्रोदा का रुख

पित्रोदा ने स्पष्ट किया कि मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में आयोजित कार्यक्रम एक निजी आयोजन था और हर संगठन को ऐसे कार्यक्रम करने का अधिकार है। उन्होंने कहा, 'मैं जानता हूं कि न्यूयॉर्क के मेयर ने अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन वह एक निजी कार्यक्रम था। हर किसी को अपना निजी कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार है। इसमें कोई समस्या नहीं है।' हालांकि जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या वे ममदानी की आरएसएस संबंधी राय से सहमत हैं, तो उन्होंने कहा कि ममदानी के विचार उनके निजी हैं — और इसके बाद भारत की धार्मिक-सामाजिक स्थिति पर अपनी राय साझा की।

धर्मनिरपेक्षता और संस्थापक विरासत पर ज़ोर

पित्रोदा ने कहा, 'मेरा मानना है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। मैं ऐसे भारत में विश्वास करता हूं जहां धर्म, जाति, भाषा या राज्य के आधार पर कोई भेदभाव न हो।' उन्होंने संविधान निर्माताओं की कल्पना का हवाला देते हुए कहा कि वे 'समान अधिकारों, सत्य, विश्वास, प्रेम और न्याय में भरोसा करते हैं, न कि नफरत में।'

पित्रोदा ने अपने बचपन के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया, 'मेरा जन्म 1942 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। मैं एक छोटे से आदिवासी गांव में पला-बढ़ा। हमारे सामने मुस्लिम परिवार रहता था, बाईं तरफ जैन परिवार था, दाईं तरफ सिख परिवार था और पीछे आदिवासी ओड़िया समुदाय के लोग रहते थे। हम सब शांति और सद्भाव के साथ रहते थे। कोई संघर्ष नहीं था।'

अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और आरएसएस पर आरोप

पित्रोदा ने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। उन्होंने कहा, 'आप किसी आम मुस्लिम या ईसाई से पूछिए कि पिछले 15 वर्षों में उन्होंने कैसा महसूस किया है, उनके चर्चों और समुदायों के साथ क्या हुआ है, वे आपको खुद बताएंगे।' उन्होंने शिक्षा और अन्य सार्वजनिक संस्थानों पर आरएसएस के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए।

पित्रोदा ने यह भी आरोप लगाया कि आरएसएस के बयानों और उसके कामकाज के बीच अंतर है। उन्होंने कहा, 'उनकी बातें कुछ और कहती हैं और उनके काम कुछ और। मेरे लिए कर्म शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी मोहन भागवत से कभी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई, हालांकि वे कुछ आरएसएस सदस्यों को निजी तौर पर जानते हैं।

विविधता का सम्मान, हिंसा पर आपत्ति

पित्रोदा ने कहा, 'मैं उनका सम्मान करता हूं। मैं विविधता का सम्मान करता हूं। लेकिन जब बात हिंसा तक पहुंच जाती है, तब मुझे समस्या होती है। जब नफरत बढ़ती है, तब मुझे समस्या होती है।' उन्होंने आरएसएस सहित सभी भारतीय संगठनों से अपील की कि वे संस्थापक नेताओं के उस मूल विचार की ओर लौटें जिसमें 'भारत सबका है — हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों, दलितों और हर समुदाय का।'

आरएसएस: एक परिचय

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी। संगठन ने 2025 में अपना 100वां वर्ष पूरा किया। आरएसएस स्वयं को एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बताता है, जो राष्ट्र सेवा और चरित्र निर्माण के लिए काम करता है। पित्रोदा की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत-अमेरिका संबंधों और भारतीय प्रवासी समुदाय की राजनीतिक सक्रियता पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान बढ़ा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और क्या यह कूटनीतिक संवेदनशीलता की अनदेखी है। दूसरी तरफ, अल्पसंख्यक समुदायों की असुरक्षा का सवाल केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का मसला है जिसे तथ्यों और आंकड़ों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। आरएसएस के 'बयान और काम में अंतर' का आरोप गंभीर है, लेकिन इसे प्रमाण के साथ सामने रखना ज़रूरी है — अन्यथा यह राजनीतिक आरोपबाज़ी तक सिमट जाता है।
RashtraPress
28 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सैम पित्रोदा ने ममदानी की आरएसएस आलोचना पर क्या कहा?
पित्रोदा ने कहा कि ममदानी की बातों में 'कुछ सच्चाई' है और यह भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर उठने वाली चिंताओं को दर्शाती है। उन्होंने यह भी माना कि मोहन भागवत का न्यूयॉर्क कार्यक्रम एक निजी आयोजन था।
जोहरान ममदानी ने आरएसएस पर क्या टिप्पणी की थी?
न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने आरएसएस की आलोचना की थी, जिसके बाद पित्रोदा ने उनके विचारों से आंशिक सहमति जताई। ममदानी की टिप्पणी का सटीक विवरण स्रोत में उपलब्ध नहीं है।
पित्रोदा ने भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर क्या कहा?
पित्रोदा ने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। उन्होंने कहा कि किसी भी आम मुस्लिम या ईसाई से पूछने पर वे खुद इस बदलाव की गवाही देंगे।
पित्रोदा का आरएसएस के बारे में व्यक्तिगत रुख क्या है?
पित्रोदा ने कहा कि उनकी मोहन भागवत से कभी मुलाकात नहीं हुई, लेकिन वे कुछ आरएसएस सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। उन्होंने विविधता का सम्मान करने की बात कही, लेकिन हिंसा और नफरत पर आपत्ति जताई और आरएसएस के बयानों और कार्यों के बीच अंतर का आरोप लगाया।
आरएसएस क्या है और इसकी स्थापना कब हुई?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी और संगठन ने 2025 में अपना 100वां वर्ष पूरा किया। आरएसएस स्वयं को एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बताता है जो राष्ट्र सेवा और चरित्र निर्माण के लिए काम करता है।
राष्ट्र प्रेस
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