सैम पित्रोदा: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था अप्रासंगिक, नए वैश्विक संविधान की जरूरत
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा ने 28 अगस्त को न्यूयॉर्क से दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित वैश्विक व्यवस्था आज की जटिल दुनिया के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है। उनके अनुसार, दुनिया को एक नए वैश्विक संविधान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), समानता तथा जलवायु कार्रवाई पर केंद्रित नई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सख्त जरूरत है।
मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की सीमाएं
पित्रोदा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान वैश्विक ढांचा — जिसने संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व व्यापार संगठन (WTO), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और नाटो जैसी संस्थाओं को जन्म दिया — अब काम नहीं कर रहा। उन्होंने कहा, "दुनिया की वर्तमान व्यवस्था आखिरी बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई थी। लेकिन अब वह व्यवस्था काम नहीं कर रही है।"
उनका तर्क है कि शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति मौलिक रूप से बदल चुकी है, फिर भी वैश्विक शासन का ढांचा दशकों पुराना बना हुआ है।
अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और बहुध्रुवीय विश्व
पित्रोदा ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिस्पर्धा ने पूरी वैश्विक बहस को अपने में समेट लिया है, जबकि असली सवाल यह है कि दुनिया को किसी एक महाशक्ति के प्रभुत्व की जरूरत ही नहीं है। उन्होंने कहा, "आज पूरी दुनिया इस बात पर लड़ रही है कि वैश्विक शक्ति अमेरिका हो या चीन। दोनों देशों के बीच टकराव है, लेकिन कोई यह नहीं कह रहा कि अब दुनिया को एक ही वैश्विक शक्ति की जरूरत नहीं है।"
उन्होंने एक नेटवर्क-आधारित बहुध्रुवीय व्यवस्था की वकालत की, जहां कई शक्ति केंद्र मिलकर राष्ट्रीय सीमाओं से परे की चुनौतियों का सामना करें।
नई वैश्विक संस्थाओं और संविधान की मांग
पित्रोदा ने रेखांकित किया कि पिछले 80 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र जैसी एक भी नई वैश्विक संस्था नहीं बनाई गई। उन्होंने विशेष रूप से AI शासन, समानता और न्याय पर केंद्रित नए अंतरराष्ट्रीय निकायों की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा, "हमें AI के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की जरूरत है। क्या हमें समानता और न्याय पर काम करने वाली संस्था नहीं चाहिए? लेकिन इन मुद्दों पर कोई बात ही नहीं करता।"
उन्होंने एक वैश्विक संविधान का प्रस्ताव रखा, जो मानव विकास, जलवायु संरक्षण, अहिंसा, समानता, न्याय और महिलाओं की भूमिका जैसे साझा मूल्यों पर आधारित हो। उनके अनुसार, "अगर हम 20 ऐसे मुद्दों पर सहमत हो जाएं, तो वही एक वैश्विक संविधान की शुरुआत होगी, जिसका पालन सभी करें।"
AI और अफ्रीका: दो अहम प्राथमिकताएं
पित्रोदा ने कहा कि AI इस वैश्विक पुनर्गठन की शुरुआत करने का एक अनोखा अवसर प्रदान करता है। उनके अनुसार, "AI एक शानदार अवसर और शक्तिशाली उपकरण है। हमें इस पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।"
इसके साथ ही उन्होंने अफ्रीका के विकास के लिए एक वैश्विक योजना — लगभग मार्शल प्लान जैसी बड़ी पहल — की मांग की। उनका तर्क है कि अफ्रीका की आबादी बढ़कर लगभग तीन अरब होने वाली है और वहां की आर्थिक चुनौतियां भविष्य में बड़े पैमाने पर प्रवासन का कारण बन सकती हैं।
बदलाव की समयसीमा और राजनीतिक इच्छाशक्ति
पित्रोदा ने स्वीकार किया कि इस परिवर्तन में 25 साल तक का समय लग सकता है, लेकिन उन्होंने जोर दिया कि शुरुआत अभी होनी चाहिए। उनके अनुसार राष्ट्रीय सीमाओं का महत्व कम हो रहा है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व में व्यवस्था को बदलने की इच्छाशक्ति की कमी सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा, "दुनिया मुश्किल दौर में है और एक चौराहे पर खड़ी है। नई व्यवस्था पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। न कोई संवाद है और न ही कोई मंच।" यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक मंचों पर बहुपक्षवाद की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।