18 अक्टूबर 2026
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रुबियो बोले — भारत अहम साझेदार, रूसी तेल पर 60 दिन की छूट का बचाव किया

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रुबियो बोले — भारत अहम साझेदार, रूसी तेल पर 60 दिन की छूट का बचाव किया

सारांश

अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने माना कि भारत रूसी तेल पर काफी हद तक निर्भर है और एक दिन में यह बदलना असंभव है। ट्रंप की 60 दिन की छूट दरअसल वाशिंगटन की उस मजबूरी का प्रतिबिंब है जिसमें वह रूस पर दबाव और भारत जैसे साझेदारों से रिश्ते — दोनों एक साथ साधना चाहता है।

मुख्य बातें

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 18 अक्टूबर 2026 को रूसी प्रतिबंधों पर 60 दिन की छूट का बचाव किया।
रुबियो ने कहा कि भारत अमेरिका का 'अहम मित्र और साझेदार' है जो अभी भी रूसी तेल पर काफी हद तक निर्भर है।
रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज ने छूट को 'गलती' बताया और कहा कि इससे पुतिन को फायदा मिलेगा; रुबियो ने इनकार किया।
रुबियो ने ईरान संघर्ष , होर्मुज स्ट्रेट , हूती हमले और रूस यूक्रेन युद्ध को वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर दबाव के कारणों में गिनाया।
भारत फरवरी 2022 से रूसी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 18 अक्टूबर 2026 को पत्रकारों से बात करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस निर्णय का बचाव किया, जिसमें रूस से जुड़े प्रतिबंधों के मामले में 60 दिन की छूट दी गई है। रुबियो ने कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण मित्र और साझेदार है, और वह अभी भी अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए काफी हद तक रूसी तेल पर निर्भर है। उनके अनुसार, टैरिफ और प्रतिबंध एक साथ लागू करने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

रुबियो का तर्क: समय चाहिए, जल्दबाज़ी नहीं

रुबियो ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप इस 60 दिन की अवधि का उपयोग यह आकलन करने के लिए करना चाहते हैं कि यदि प्रतिबंध और टैरिफ एक साथ लागू किए जाएँ तो उनके क्या परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा, "मुद्दा सिर्फ रूस पर प्रतिबंधों का नहीं है। इसमें भारत समेत कई देशों पर लगने वाले टैरिफ भी शामिल हैं।"

उन्होंने यह भी माना कि भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन "एक दिन में पूरी व्यवस्था बदलना संभव नहीं होता।" यह टिप्पणी उस व्यावहारिक राजनयिक संतुलन को रेखांकित करती है जो वाशिंगटन को नई दिल्ली के साथ बनाए रखना है।

टेड क्रूज की आलोचना और रुबियो का जवाब

रुबियो की यह टिप्पणी रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज की कड़ी आलोचना के जवाब में आई। क्रूज ने 60 दिन की इस छूट को 'गलती' बताते हुए आरोप लगाया था कि इससे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फायदा मिलेगा। रुबियो ने इस बात से सीधे इनकार किया और कहा, "वह डीजल किसी न किसी तरीके से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकना ही था।" उन्होंने यह भी बताया कि पहले भी जब होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल परिवहन में बाधाएँ आई थीं, तब भी अमेरिका ने ऐसी ही 60 दिन की छूट दी थी।

वैश्विक ऊर्जा संकट की पृष्ठभूमि

रुबियो ने बताया कि अमेरिकी प्रशासन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार को प्रभावित करने वाली कई घटनाओं पर नज़र रख रहा है — जिनमें ईरान से जुड़ा संघर्ष, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की स्थिति, सऊदी अरब पर हूती हमले और रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा ढाँचे को हुई क्षति शामिल हैं। उनके अनुसार, इन घटनाओं से वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ा है और प्रतिबंध लागू करने का निर्णय और जटिल हो गया है।

गौरतलब है कि फरवरी 2022 में रूस यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में आई उथल पुथल के बीच रूसी कच्चा तेल भारत के कुल आयात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। यह ऐसे समय में आया है जब भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसके ऊर्जा खरीद संबंधी निर्णय देश की ज़रूरतों, सस्ती कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।

भारत अमेरिका संबंध: कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा

रुबियो के ताज़ा बयान यह दर्शाते हैं कि वाशिंगटन एक ओर रूस पर दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को भी संभालकर रखना चाहता है। उन्होंने स्वीकार किया कि अमेरिका में भी लोग बढ़ी हुई ऊर्जा कीमतों का असर झेल रहे हैं, लेकिन कुछ अन्य देशों की स्थिति इससे भी कहीं ज़्यादा कठिन है।

यह टिप्पणी इस बात की पुष्टि करती है कि भारत अमेरिका साझेदारी अब केवल रक्षा या प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं — ऊर्जा भू राजनीति भी इस रिश्ते की नई धुरी बनती जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

असली सवाल यह है कि इन 60 दिनों के बाद नीति में कोई ठोस बदलाव आएगा या यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। भारत की स्थिति स्पष्ट है — वह किसी भी महाशक्ति के दबाव में अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा; और वाशिंगटन को यही बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनी पड़ रही है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका स्वयं घरेलू ऊर्जा कीमतों के दबाव में है, जो इस पूरे समीकरण को और पेचीदा बना देता है।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रूसी प्रतिबंधों पर 60 दिन की छूट क्या है?
यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह निर्णय है जिसमें रूस से जुड़े प्रतिबंधों को तत्काल लागू करने के बजाय 60 दिन का समय दिया गया है। इस अवधि में अमेरिकी प्रशासन टैरिफ और प्रतिबंधों के एक साथ लागू होने के संभावित आर्थिक प्रभावों का अध्ययन करेगा।
रुबियो ने भारत का ज़िक्र क्यों किया?
रुबियो ने भारत का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि भारत अभी भी रूसी तेल का एक बड़ा खरीदार है और अमेरिका का रणनीतिक साझेदार भी है। उनके अनुसार, भारत जैसे देशों को रातोंरात रूसी ऊर्जा से अलग करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
टेड क्रूज ने इस छूट पर क्या आपत्ति जताई?
रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज ने 60 दिन की इस छूट को 'गलती' बताते हुए कहा कि इससे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फायदा मिलेगा। रुबियो ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि रूसी डीजल किसी न किसी तरीके से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बिकता ही।
भारत रूसी तेल क्यों खरीद रहा है?
फरवरी 2022 में रूस यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में उथल पुथल के बीच रूसी कच्चा तेल भारत के लिए सस्ता और सुलभ विकल्प बन गया। भारत का कहना है कि उसके ऊर्जा खरीद संबंधी निर्णय देश की ज़रूरतों, सस्ती कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर अभी क्या दबाव है?
रुबियो के अनुसार, ईरान संघर्ष, होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति, सऊदी अरब पर हूती हमले और रूस यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा ढाँचे को हुई क्षति — ये सभी मिलकर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। इन परिस्थितियों में प्रतिबंध लागू करने का निर्णय और जटिल हो गया है।
राष्ट्र प्रेस
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