रूसी तेल पर 100% टैरिफ कानून के बीच रुबियो का भारत को संदेश: ऊर्जा सुरक्षा में देगा अमेरिका साथ
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में कहा कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले हालिया अमेरिकी कानून के बावजूद, अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदार देशों की ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने में मदद करने की स्थिति में है। यह बयान विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के बाद अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से जारी किया गया।
जयशंकर रुबियो बैठक का मुख्य घटनाक्रम
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करके बताया कि उन्होंने रुबियो के साथ बैठक में ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट (SRIA) को लेकर भारत के हितों और चिंताओं को एक बार फिर स्पष्ट रूप से सामने रखा। अमेरिकी विदेश विभाग ने पुष्टि की कि दोनों नेताओं ने रूस और ईरान के साथ आर्थिक संबंध रखने वाले देशों पर संभावित प्रतिबंधों पर विस्तृत चर्चा की।
विभाग के आधिकारिक बयान के अनुसार, रुबियो ने जोर दिया कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने में मदद करने की अच्छी स्थिति में है। हालाँकि, यह सहायता किस स्वरूप में दी जाएगी, इसका विस्तृत ब्यौरा नहीं दिया गया।
राष्ट्रपति को छूट देने का अधिकार
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रुबियो ने स्पष्ट किया कि इस कानून में राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर विशेष मामलों में छूट देने का अधिकार दिया गया है। उन्होंने कहा, "अब राष्ट्रपति के पास एक ऐसा साधन है, जिसका इस्तेमाल वह सिर्फ रूस यूक्रेन संघर्ष पर असर डालने के लिए ही नहीं, बल्कि ईरान से जुड़े मामलों में भी कर सकते हैं।" यह छूट का प्रावधान भारत जैसे साझेदार देशों के लिए राहत का एक संभावित रास्ता खोलता है, हालाँकि इसका अंतिम निर्णय राष्ट्रपति पर निर्भर है।
भारत पर संभावित आर्थिक असर
यदि यह 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है, तो इसका सीधा असर अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर पड़ सकता है। साथ ही, दोनों देशों के बीच जारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ता में भी यह बड़ी रुकावट बन सकता है। गौरतलब है कि रूस भारत को तेल और रक्षा उपकरण आपूर्ति करने वाला प्रमुख देश है, और रूस के कुल तेल निर्यात का करीब 37 प्रतिशत भारत द्वारा खरीदा जाता है।
यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले साल अगस्त में रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर अलग से 25 प्रतिशत टैरिफ लगा चुके थे — जिसे बाद में फरवरी में वापस ले लिया गया था। नए कानून के तहत यह दर चार गुना बढ़कर 100 प्रतिशत हो जाएगी, जो भारत अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए कहीं अधिक गंभीर स्थिति बना सकती है।
ईरान बनाम रूस: भारत के लिए क्या दाँव पर
भारत के लिए ईरान के मुकाबले रूस के साथ व्यापारिक संबंध कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। 2019 में भारत ने ईरान से तेल की खरीद काफी कम कर दी थी और ईरान को भारतीय निर्यात मुख्यतः चावल, खाद्य पदार्थों और दवाओं तक सीमित रहा है, जिन्हें मानवीय आधार पर प्रतिबंधों से छूट मिली हुई है। इस साल की पहली छमाही में ईरान को भारत का निर्यात केवल करीब 40 करोड़ डॉलर था, और यूएई के रास्ते होने वाला यह व्यापार खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष के कारण प्रभावित हो गया है।
इसी अवधि में छूट के तहत ईरान से भारत का तेल और गैस आयात करीब 70 करोड़ डॉलर का था — एक आँकड़ा जो रूसी तेल पर भारत की निर्भरता के मुकाबले बेहद छोटा है। इस असमानता को देखते हुए, SRIA कानून का सबसे बड़ा आर्थिक जोखिम भारत के लिए रूसी तेल के मोर्चे पर है, न कि ईरान के मामले में।
आगे क्या होगा
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रपति भारत के मामले में छूट के प्रावधान का इस्तेमाल करेंगे या नहीं। रुबियो के बयान को कूटनीतिक आश्वासन के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन ठोस नीतिगत प्रतिबद्धता अभी सामने नहीं आई है। भारत अमेरिका व्यापार वार्ता और ऊर्जा सहयोग की दिशा आने वाले हफ्तों में इस मामले में निर्णायक भूमिका निभाएगी।