समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कोलकाता-मुंबई में 1.4 करोड़ लोगों पर खतरा: संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की एक ताज़ा रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी दी गई है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर कोलकाता और मुंबई समेत दक्षिण एशिया के प्रमुख शहरों में रहने वाले 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घरों को स्थायी रूप से जलमग्न कर सकता है। 1 सितंबर 2026 को पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स की 55वीं बैठक में यह रिपोर्ट जारी की गई, जिसकी मेजबानी प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश पलाऊ ने की।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में समुद्र के जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई और यह लगभग छह मिलीमीटर दर्ज की गई। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर और बर्फ की परतें पिघल रही हैं और समुद्री जल गर्म होकर फैल रहा है, जिसका असर संपत्ति, आबादी और यहाँ तक कि सांस्कृतिक विरासत पर भी पड़ रहा है।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों — विशेष रूप से भारत के कोलकाता और मुंबई तथा बांग्लादेश के ढाका — में विस्थापन का सबसे बड़ा खतरा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस संकट के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है।
वैश्विक स्तर पर खतरे का आकार
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 77 करोड़ लोग — यानी पृथ्वी पर प्रत्येक दस में से लगभग एक व्यक्ति — उन तटीय इलाकों में रहते हैं जो हाई-टाइड लाइन से पाँच मीटर से भी कम ऊँचे हैं। इन क्षेत्रों में पहले से ही गंभीर खतरे मौजूद हैं।
आर्थिक नुकसान के आकलन में रिपोर्ट ने बताया कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से वैश्विक स्तर पर कम से कम 1.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के बुनियादी ढाँचे को खतरा है। अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क तथा चीन के ग्वांगझू जैसे उच्च-आय वाले शहरों में खतरे में पड़ी संपत्तियों का अनुमानित मूल्य 2 ट्रिलियन डॉलर से 3.5 ट्रिलियन डॉलर के बीच आँका गया है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
न्यूयॉर्क में एक प्रेस वार्ता में संयुक्त राष्ट्र के असिस्टेंट सेक्रेटरी-जनरल नाविद हनीफ ने कहा, "समुद्र के बढ़ते जलस्तर को एक बड़ी व्यवस्थागत समस्या के तौर पर देखें, क्योंकि इसका असर सेहत, खाद्य सुरक्षा, मानवाधिकारों और संस्कृति पर पड़ेगा। आप अपनी पुश्तैनी ज़मीन और अपनी पहचान खो देंगे।" उन्होंने सरकारों से इस संकट को अपनी नीति-निर्माण प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
हनीफ ने हिमालय के ग्लेशियरों को 'तीसरा ध्रुव' बताते हुए कहा कि अगले 15 से 20 वर्षों में दक्षिण एशिया को पहले भीषण बाढ़ और फिर दीर्घकालिक सूखे का सामना करना पड़ सकता है, जिससे फसलें और खाद्य सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित होंगी।
हिमालयी संकट की पृष्ठभूमि
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब पिछले सप्ताह नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिमालय से ग्लेशियर टूटकर गिरने से पानी और कीचड़ का सुनामी जैसा सैलाब आया, जिसमें कथित तौर पर सैकड़ों लोगों की जान गई और कई इलाके तबाह हो गए। गौरतलब है कि यह घटना इस बात की ताज़ा मिसाल है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब अमूर्त भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर वास्तविकता बन चुके हैं।
आगे क्या होगा
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह खतरा भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता — द्वीपीय देशों से लेकर महाद्वीपीय महानगरों तक सभी इसकी चपेट में हैं। शहरी बुनियादी ढाँचे, जल प्रणालियों, परिवहन, ऊर्जा ग्रिड और भूजल संसाधनों को नुकसान पहले से ही शुरू हो चुका है। रिपोर्ट सरकारों से माँग करती है कि वे दीर्घकालिक योजनाओं में समुद्री जलस्तर वृद्धि को केंद्रीय चुनौती के रूप में शामिल करें, अन्यथा मानवाधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व पर दूरगामी परिणाम अवश्यंभावी हैं।