महाराष्ट्र पर गंभीर सूखे का खतरा: मानसून गायब, बांधों में सिर्फ 25% पानी — शिवसेना (यूबीटी)
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने सोमवार, 15 जून को चेतावनी दी कि भीषण गर्मी और मानसून की अनुपस्थिति के बीच महाराष्ट्र अब गंभीर सूखे की कगार पर खड़ा है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि मानसून की पारंपरिक आगमन तिथि 7 जून बीत चुकी है और राज्य के 3,028 बांधों में जलस्तर खतरनाक रूप से 25 प्रतिशत तक गिर चुका है।
मानसून की स्थिति और अल-नीनो का खतरा
संपादकीय के अनुसार, जून के पहले सप्ताह में उम्मीद जगी थी जब मानसून समय पर अंडमान द्वीप समूह पहुँचा और केरल से कर्नाटक की ओर सामान्य रूप से आगे बढ़ा। लेकिन 6 जून के बाद मौसम का पैटर्न अचानक पलट गया — मानसून की रफ्तार थम गई और यह महाराष्ट्र-गोवा सीमा पर ही रुक गया।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने पहले ही खतरनाक अल-नीनो मौसम पैटर्न के सक्रिय होने की चेतावनी जारी की थी। विशेषज्ञों के अनुसार यह पिछले 150 वर्षों में देखा गया सबसे प्रबल अल-नीनो प्रभाव हो सकता है। प्रशांत महासागर में बढ़ते तापमान के साथ-साथ अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में वर्षा के लिए आवश्यक कारक न्यूट्रल बने हुए हैं, जिससे स्थिति और विकट होती जा रही है।
बांध और जलाशयों की चिंताजनक स्थिति
ठाकरे गुट ने संपादकीय में बताया कि महाराष्ट्र के 3,028 छोटे-बड़े बांधों में जलस्तर खतरनाक रूप से नीचे आ गया है। मुंबई को पेयजल आपूर्ति करने वाले सात प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का मात्र 12.48 प्रतिशत पानी शेष है। इसके चलते महाराष्ट्र सरकार के जल संसाधन विभाग ने कृषि के लिए जलापूर्ति पूरी तरह बंद कर दी है और शेष जल को केवल पेयजल के लिए सुरक्षित रखा गया है।
कृषि पर असर: बुवाई ठप, किसान चिंतित
संपादकीय के अनुसार, इस वर्ष मानसून की वर्षा न होने के कारण पूरे महाराष्ट्र में बुवाई का कार्य पूरी तरह रुका हुआ है। राज्य पिछले 40 से 50 वर्षों की सबसे भीषण गर्मियों में से एक से गुजर रहा है। भीषण हीटवेव ने खेती की जमीन को झुलसा दिया है, कुएँ सूख गए हैं और अनगिनत झीलें रिक्त हो चुकी हैं।
सरकार ने किसानों को सलाह दी है कि वे छिटपुट बारिश के आधार पर जल्दबाजी में बुवाई न करें, बल्कि मिट्टी में पर्याप्त और लगातार नमी आने तक प्रतीक्षा करें। ठाकरे गुट ने कहा, 'बुवाई तो दूर की बात है, ग्रामीण इलाकों में मानसून से पहले की सामान्य कृषि तैयारियाँ भी नहीं दिख रहीं।' अनुभवी किसान आमतौर पर दो से चार बार भारी वर्षा होने के बाद ही बुवाई करते हैं, ताकि दोबारा बुवाई के आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।
शिवसेना (यूबीटी) की माँग
ठाकरे गुट ने किसानों, नागरिकों और सरकार से इस आसन्न संकट से निपटने के लिए तत्काल तैयारी करने का आह्वान किया है। संपादकीय में कहा गया कि WMO का दीर्घकालिक देरी और कम वर्षा का अनुमान अब एक कठोर वास्तविकता में बदलता दिख रहा है, और इसे नजरअंदाज करना राज्य के लिए घातक साबित हो सकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे सूखा-प्रवण क्षेत्र पहले से ही जल संकट की मार झेल रहे हैं। यदि मानसून और विलंबित रहा, तो राज्य में खाद्य उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और पेयजल आपूर्ति — तीनों मोर्चों पर संकट गहरा सकता है।