शशि थरूर ने जेन-जी प्रोटेस्ट पर भारत के लोकतंत्र की तारीफ की, बोले — 'सिस्टम झुका, टूटा नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने 27 अगस्त को नई दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी वर्ल्ड अन्विका समिट में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि हालिया जेन-जी विरोध प्रदर्शनों के दबाव में भारतीय सिस्टम झुका, लेकिन टूटा नहीं। उन्होंने दक्षिण एशिया के छह देशों में युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों की तुलना करते हुए भारत को एक अलग और मजबूत उदाहरण बताया।
दक्षिण एशिया में जेन-जी का उभार
थरूर ने बताया कि पिछले एक दशक में छह प्रमुख दक्षिण एशियाई देशों में युवा आबादी ने बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज़ बुलंद की। उन्होंने कहा, '2012 में म्यांमार विरोध से शुरू होकर, हमने पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और हाल ही में भारत में युवाओं को सड़कों पर उतरते देखा।' उनके अनुसार, ये सभी आंदोलन अलग-अलग रूपों में जेन-जी के गुस्से और बदलाव की चाहत की अभिव्यक्ति थे।
अलग-अलग देशों में अलग-अलग परिणाम
थरूर ने प्रत्येक देश के अनुभव का विश्लेषण करते हुए बताया कि बांग्लादेश और श्रीलंका में मौजूदा शासक युवा विद्रोह को संभाल नहीं पाए और उन्हें सत्ता छोड़कर भागना पड़ा, जिससे नए नेतृत्व का रास्ता खुला। नेपाल में भी सत्ता परिवर्तन हुआ — नए सिरे से चुनाव हुए और नई सरकार ने कार्यभार संभाला, हालाँकि यह प्रक्रिया श्रीलंका और बांग्लादेश से भिन्न रही।
पाकिस्तान में सेना ने हस्तक्षेप किया और, थरूर के शब्दों में, एक 'कठपुतली सरकार' स्थापित हुई। म्यांमार में स्थिति सबसे गंभीर रही — वहाँ पूर्ण सैन्य अधिग्रहण हुआ।
भारत का स्व-सुधार तंत्र
कांग्रेस सांसद ने तर्क दिया कि भारत इन सभी देशों से इसलिए अलग है क्योंकि यहाँ एक कार्यशील और संस्थागत रूप से मजबूत लोकतांत्रिक ढाँचा मौजूद है। उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में एक स्व-सुधार तंत्र है, जिसने यह सुनिश्चित किया कि जेन-जी प्रदर्शनकारियों की आवाज़ सुनी जाए और सरकार उनकी माँगों का जवाब देने के लिए मजबूर हुई।
उन्होंने कहा, 'इन विरोध प्रदर्शनों में अंतर इस बात का है कि इन देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं और राजनीतिक प्रतिष्ठान ने उनसे कैसे निपटा।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब दक्षिण एशिया में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है।
संस्थागत लचीलेपन का संदेश
थरूर की टिप्पणियों का मूल सार यह था कि भारत की संस्थागत लचीलापन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं ने इसे बिना ढहे दबाव झेलने में सक्षम बनाया — जो पड़ोसी देशों में देखी गई नाटकीय राजनीतिक उथल-पुथल के बिल्कुल विपरीत है। गौरतलब है कि थरूर स्वयं एक पूर्व राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो दक्षिण एशियाई राजनीति पर गहरी समझ रखते हैं।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत में जेन-जी आंदोलन से उठी माँगों पर नीति-निर्माण के स्तर पर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।