यूनेस्को मान्यता प्राप्त ठठेरा शिल्प को नई पहचान: ऑस्ट्रेलियाई कलाकार और पंजाब के शिल्पकार की साझा प्रदर्शनी
सारांश
मुख्य बातें
ऑस्ट्रेलियाई कलाकार एलियट बैस्टियानॉन और पंजाब के मास्टर ताम्र शिल्पकार हरि कृष्ण ने नई दिल्ली में 'एनालॉग एंड अल्केमी' नामक एक संयुक्त प्रदर्शनी आयोजित की है, जिसमें यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त ठठेरा धातु शिल्प परंपरा और समकालीन मूर्तिकला का दुर्लभ संगम प्रस्तुत किया गया है। यह प्रदर्शनी सदियों पुरानी तांबे-पीतल की हस्तशिल्प कला को संरक्षित करने की दिशा में भारत-ऑस्ट्रेलिया सांस्कृतिक सहयोग का एक उल्लेखनीय उदाहरण बनकर उभरी है।
प्रदर्शनी में क्या है खास
'एनालॉग एंड अल्केमी' प्रदर्शनी में दो बिल्कुल अलग कलात्मक दुनियाओं का मिलन देखने को मिलता है। एक ओर हैं एलियट बैस्टियानॉन, जो नई दिल्ली में रहकर काम करते हैं और धातु की एक जैसी आकृतियों को जोड़कर दीवार पर लगाने योग्य तथा स्वतंत्र रूप से खड़ी रहने वाली मूर्तियाँ तैयार करते हैं। वह विशेष इलेक्ट्रोप्लेटिंग तकनीक का उपयोग कर अपनी कलाकृतियों को चट्टान जैसी मज़बूत और आकर्षक बनावट देते हैं।
दूसरी ओर हैं हरि कृष्ण, जिनके परिवार में तांबे और पीतल के बर्तन हाथ से बनाने की यह पारंपरिक कला 200 वर्षों से भी अधिक समय से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इन दोनों की साझेदारी यह दर्शाती है कि परंपरा और नवाचार मिलकर नई कलात्मक अभिव्यक्तियाँ रच सकते हैं।
ठठेरा शिल्प: विरासत और संकट
यूनेस्को के अनुसार, पंजाब के जंडियाला गुरु के ठठेरा समुदाय की यह पारंपरिक कला तांबे, पीतल और अन्य मिश्र धातुओं से हाथ से बर्तन बनाने की विशेष तकनीक पर आधारित है। इन धातुओं को स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माना जाता है। गौरतलब है कि यह शिल्प आज विलुप्त होने के कगार पर है — मशीनी उत्पादन और बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं ने इस हुनर को जीविका के रूप में अनिश्चित बना दिया है। ऐसे में यह प्रदर्शनी महज़ एक कला-आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया सांस्कृतिक संबंधों की झलक
भारत में ऑस्ट्रेलियाई उच्चायोग ने इस प्रदर्शनी की सराहना करते हुए अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम पर लिखा, "नवाचार तब सबसे बेहतर होता है जब परंपरा और आधुनिकता साथ आते हैं।" उच्चायोग ने इसे "अंतरराष्ट्रीय रचनात्मक सहयोग का बेहतरीन उदाहरण" बताया, जो उत्तर भारत की पीढ़ियों से चली आ रही दुर्लभ धातु शिल्प परंपरा को संरक्षण देने के साथ-साथ नई कलात्मक संभावनाओं को भी बढ़ावा देता है।
यह सहयोग ऐसे समय में आया है जब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापार, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में संबंध तेज़ी से प्रगाढ़ हो रहे हैं। सांस्कृतिक कूटनीति के नज़रिए से यह प्रदर्शनी दोनों देशों के बीच लोगों से लोगों के जुड़ाव को नई ऊँचाई देती है।
आगे की राह
इस साझेदारी से यह उम्मीद जगी है कि ठठेरा जैसे संकटग्रस्त शिल्पों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पारंपरिक शिल्पकारों को समकालीन कलाकारों और वैश्विक बाज़ार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक यूनेस्को की मान्यता केवल कागज़ी सम्मान बनकर रह जाएगी। हरि कृष्ण और एलियट बैस्टियानॉन की यह जोड़ी उस दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।