ट्रंप प्रशासन का विश्वविद्यालयों की विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता का नया कदम
सारांश
Key Takeaways
- विदेशी फंडिंग की निगरानी को कड़ा किया गया है।
- नया पारदर्शिता पोर्टल लॉन्च किया गया है।
- यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए है।
- विदेशी कंपनियों से मिलने वाली फंडिंग को भी रिपोर्ट करना होगा।
- अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग पर कोई प्रतिबंध नहीं।
वाशिंगटन, २४ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने विदेशी स्रोतों से विश्वविद्यालयों को मिलने वाली फंडिंग के प्रति निगरानी को और कड़ा करने का एक नया कदम उठाया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह पहल अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग को बाधित करने के लिए नहीं, बल्कि पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई है।
इस घोषणा के तहत, अमेरिकी शिक्षा विभाग और अमेरिकी विदेश विभाग के उच्च अधिकारियों ने मिलकर एक नया सार्वजनिक रिपोर्टिंग पोर्टल शुरू किया है। इस पोर्टल के माध्यम से विश्वविद्यालय आसानी से विदेशी स्रोतों से प्राप्त उपहार और अनुबंध की जानकारी दर्ज कर सकेंगे, जिससे आम जनता भी इन आंकड़ों को देख पाएगी।
पब्लिक डिप्लोमेसी की अंडर सेक्रेटरी सारा रोजर्स ने बताया कि हायर एजुकेशन एक्ट की धारा 117 एक कानूनी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों को विदेशी फंडिंग और प्रभाव के संबंध में पारदर्शिता और जवाबदेही प्रदान करना है।
यह प्रावधान १९८६ में जोड़ा गया था, जिसके अनुसार संघीय सहायता प्राप्त करने वाले किसी भी विश्वविद्यालय को एक कैलेंडर वर्ष में एक ही विदेशी स्रोत से २.५ लाख डॉलर ($250,000) से अधिक के उपहार या अनुबंध की जानकारी देना आवश्यक है। हालाँकि, अधिकारियों का कहना है कि इस नियम का पालन हमेशा नहीं हुआ है।
शिक्षा विभाग के अनुसार, वर्ष २०२५ में अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने विदेशी संस्थाओं से ५.२ अरब डॉलर से अधिक की फंडिंग प्राप्त की। १९८६ से लेकर अब तक विदेशी स्रोतों से कुल लगभग ६७ अरब डॉलर की फंडिंग मिली है।
शिक्षा विभाग के अंडर सेक्रेटरी निकोलस केंट ने बताया कि यह पहल विदेशी निवेश पर प्रतिबंध नहीं है, बल्कि केवल रिपोर्टिंग की अनिवार्यता को मजबूत करने का प्रयास है। अधिकारियों ने इसे 'टॉर्च की रोशनी डालने' जैसा कदम बताया है ताकि यह देखा जा सके कि कहीं फंडिंग के साथ कोई प्रभाव या शर्त तो नहीं जुड़ी है।
अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी कंपनियों जैसे टाटा समूह से मिलने वाली फंडिंग भी रिपोर्टिंग के दायरे में आ सकती है, यदि यह निर्धारित सीमा से अधिक हो। शिक्षा विभाग के डिप्टी जनरल काउंसिल पॉल मूर ने कहा कि यह नियम विदेशी व्यक्तियों और सरकारों से मिलने वाली फंडिंग पर लागू होता है।
आंकड़ों के अनुसार, २०२५ में चीन से लगभग ५३० मिलियन डॉलर और यूनाइटेड किंगडम से करीब ६३० मिलियन डॉलर की फंडिंग दर्ज की गई। इस सूची में शीर्ष स्थान कतर का है, जहां से लगभग १.२ अरब डॉलर प्राप्त हुए।
इस सख्त निगरानी का आधार पूर्व की जांच रिपोर्टें भी हैं। अमेरिकी सीनेट की एक द्विदलीय समिति ने विदेशी फंडिंग रिपोर्टिंग को 'ब्लैक होल' बताया था, जिसमें लगभग ७० प्रतिशत फंडिंग की जानकारी दर्ज नहीं की गई थी।
अधिकारियों के अनुसार, पूर्व जांच में पता चला कि येल विश्वविद्यालय ने चार वर्षों तक रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जबकि बड़ी मात्रा में लेनदेन हुए थे। वहीं, विदेश महाविद्यालय की अनुपालन व्यवस्था भी अपर्याप्त पाई गई थी। अनुपालन सुधारने के लिए १९ नागरिक जांचें शुरू की गईं, जिसके बाद गैर-अनुपालन दर घटकर लगभग ३५ प्रतिशत रह गई।
विदेश विभाग ने इस पहल को अनुसंधान सुरक्षा और बौद्धिक संपदा से भी जोड़ा है। अधिकारियों ने चिंता व्यक्त की है कि कुछ विदेशी सरकारें संवेदनशील तकनीकी शोध में अपने छात्रों की उपस्थिति को बढ़ावा दे सकती हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), सेमीकंडक्टर और बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बढ़ने के बीच यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते शैक्षणिक सहयोग के संदर्भ में यह नीति पारदर्शिता पर जोर देती है, लेकिन वर्तमान में विदेशी फंडिंग पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाती।
अधिकारियों ने दोहराया कि सरकार विदेशी फंडिंग पर मूल्य निर्णय नहीं दे रही है, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सभी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो और कानून का पालन हो।