रोशडेल ग्रूमिंग गैंग सरगना शब्बीर अहमद की रिहाई के बाद ब्रिटेन पाकिस्तान निर्वासन कानून बदलने पर विचार कर रहा है
सारांश
मुख्य बातें
ब्रिटेन सरकार इमिग्रेशन एक्ट 1971 के उस 55 साल पुराने प्रावधान में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर रही है, जिसकी वजह से रोशडेल ग्रूमिंग गैंग के मुख्य सरगना शब्बीर अहमद को पाकिस्तान निर्वासित करना कानूनी रूप से संभव नहीं हो पा रहा। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गृह सचिव शबाना महमूद इस बदलाव को या तो फास्ट-ट्रैक कानून के ज़रिए लागू करने या इमिग्रेशन एवं असाइलम बिल में संशोधन के रूप में शामिल करने के विकल्पों पर विचार कर रही हैं। यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब 2 जुलाई को 73 वर्षीय शब्बीर अहमद को जेल से रिहा कर दिया गया।
शब्बीर अहमद: अपराध, सज़ा और रिहाई
शब्बीर अहमद को 2022 में दो अलग-अलग ट्रायल में दुष्कर्म और यौन अपराध के आरोपों में दोषी पाए जाने के बाद 22 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी। दोषी ठहराए जाने के बाद उसकी ब्रिटेन की नागरिकता भी छीन ली गई थी। हालांकि, नागरिकता जाने के बावजूद उसे पाकिस्तान नहीं भेजा जा सका, क्योंकि इमिग्रेशन एक्ट 1971 का एक पुराना प्रावधान उन लोगों को सुरक्षा देता है जो 1973 से पहले ब्रिटेन आए थे और कम से कम पाँच साल वहाँ रहे थे।
गौरतलब है कि अहमद की पैरोल हासिल करने की तीन कोशिशें पहले ही खारिज हो चुकी थीं — सबसे हालिया याचिका अक्टूबर 2024 में अस्वीकार की गई थी। 2023 की एक आधिकारिक समीक्षा से जुड़े दस्तावेज़ में उसे यौन अपराध दोहराने का उच्च जोखिम वाला व्यक्ति बताया गया था।
पाकिस्तान का रुख और कूटनीतिक पेच
इस मामले में एक कूटनीतिक जटिलता भी है — पाकिस्तान शब्बीर अहमद को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है। इसके बदले में पाकिस्तान ब्रिटेन में रह रहे दो राजनीतिक असंतुष्टों के प्रत्यर्पण की माँग कर रहा है। यह स्थिति निर्वासन की प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देती है, क्योंकि भले ही ब्रिटेन कानून बदल ले, पाकिस्तान की सहमति के बिना निर्वासन संभव नहीं होगा।
पीड़िताओं का दर्द और सुरक्षा की माँग
अहमद की रिहाई के बाद पीड़िताओं ने अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता ज़ाहिर की है। रूबी नामक एक पीड़िता समेत अन्य पीड़ितों ने सरकार से कानून में बदलाव की अपील की है। एक अन्य पीड़िता एम्बर — जो उन लगभग 50 लड़कियों में शामिल थीं, जिनका 2008 के आसपास से अहमद और उसके नेटवर्क द्वारा यौन शोषण और मानव तस्करी की गई थी — ने कहा कि रिहाई की खबर के बाद वह शारीरिक रूप से बीमार जैसा महसूस कर रही हैं और उन्हें नींद नहीं आ रही। उन्हें अहमद और उसके सहयोगियों से अब भी खतरा महसूस होता है।
संसदीय जाँच रिपोर्ट: दशकों की विफलता उजागर
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब जून 2025 की शुरुआत में एक निजी-वित्तपोषित 219 पृष्ठ की संसदीय जाँच रिपोर्ट जारी हुई, जिसमें कई दशकों में कम से कम 2,50,000 लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना और जबरन गर्भधारण के मामले दर्ज किए गए। इस जाँच की अध्यक्षता रिफॉर्म यूके के सांसद रूपर्ट लो ने की और इसका संचालन यौन शोषण से बची पीड़िता एवं सामाजिक कार्यकर्ता सैमी वुडहाउस ने किया। यह जाँच 20,000 से अधिक लोगों के आर्थिक सहयोग से संचालित हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस, सामाजिक सेवाएँ, स्कूल, NHS, लाइसेंसिंग प्राधिकरण और स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर की लगातार सरकारों ने संगठित गिरोहों को काम करने की अनुमति दी — जिसे रिपोर्ट ने ब्रिटिश राज्य की 'सक्रिय या निष्क्रिय सहमति' करार दिया। जाँच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ब्रिटेन के कम से कम 149 स्थानीय प्रशासनिक क्षेत्रों में ऐसे गिरोहों के सक्रिय होने के सबूत मिले हैं और अदालत के रिकॉर्ड में सामूहिक बाल यौन शोषण के मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों में लगभग 87 प्रतिशत के नाम मुस्लिम थे।
रिपोर्ट में ब्रिटेन में पाकिस्तानी गैंग रेप का पहला दर्ज मामला भी शामिल है — वर्ष 1955 में ब्रैडफोर्ड के चार पाकिस्तानी पुरुषों पर मिडिल्सब्रा की एक 15 वर्षीय किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था।
आगे क्या होगा
अब सबकी नज़रें गृह सचिव शबाना महमूद के अगले कदम पर हैं। यदि फास्ट-ट्रैक कानून का रास्ता चुना गया, तो इमिग्रेशन एक्ट 1971 में जल्द संशोधन हो सकता है। हालाँकि, पाकिस्तान की असहयोगी स्थिति को देखते हुए, कानूनी बदलाव के बाद भी निर्वासन की प्रक्रिया में कूटनीतिक अड़चनें बनी रह सकती हैं। पीड़िताओं और उनके समर्थकों की माँग है कि सरकार न केवल कानून बदले, बल्कि ऐसे मामलों में पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस तंत्र भी स्थापित करे।