टुन टुन की दिलीप कुमार से दीवानगी: पहली फिल्म के लिए रखी थी यह अनोखी शर्त
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन के रूप में इतिहास में दर्ज टुन टुन — जिनका असली नाम उमा देवी खत्री था — अपनी बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग, चेहरे के अनोखे भाव और संवाद अदायगी के दम पर दर्शकों को हँसाने की अद्भुत क्षमता रखती थीं। लेकिन कम लोग जानते हैं कि अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने एक खास शर्त रखी थी — उनकी पहली फिल्म उनके पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार के साथ होनी चाहिए। यह शर्त महज एक प्रशंसक की इच्छा नहीं, बल्कि एक संघर्षशील कलाकार का आत्मसम्मान था।
दर्द भरा बचपन, फौलादी इरादा
11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के निकट एक छोटे से गाँव में जन्मी टुन टुन का बचपन त्रासदियों की छाया में बीता। बेहद कम उम्र में ज़मीन विवाद के चलते उनके माता-पिता की हत्या कर दी गई, और कुछ समय बाद उनके भाई का भी निधन हो गया। रिश्तेदारों के आसरे पले-बढ़े इस बच्चे को न प्यार मिला, न सुकून — लेकिन संगीत ने उन्हें जीने की वजह दी।
किसी औपचारिक संगीत शिक्षा के बिना, टुन टुन रेडियो पर गाने सुनकर अभ्यास करती थीं। उनकी आवाज़ में एक नैसर्गिक मिठास थी जो उन्हें भीड़ से अलग करती थी। मुंबई जाकर गायिका बनने का सपना उनके भीतर इतना गहरा था कि तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
नौशाद से मुलाकात और 'अफसाना लिख रही हूँ' की कामयाबी
मुंबई पहुँचने के बाद टुन टुन की मुलाकात मशहूर संगीतकार नौशाद से हुई। कहा जाता है कि उन्होंने नौशाद से गाने का अवसर माँगा, जिसके बाद उन्हें 1946 की फिल्म 'वामिक अजरा' में गाने का मौका मिला। असली पहचान मिली 1947 में आई फिल्म 'दर्द' के गाने 'अफसाना लिख रही हूँ' से, जो घर-घर गूँजने लगा और टुन टुन को एक स्थापित गायिका के रूप में पहचान दिलाई।
यह ऐसे समय में आया जब हिंदी फिल्म संगीत अपने स्वर्णिम दौर की दहलीज़ पर था। गौरतलब है कि उस युग में किसी महिला का बिना किसी गॉडफादर के मुंबई में अपनी आवाज़ की बदौलत पहचान बनाना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि थी।
दिलीप कुमार के साथ पहली फिल्म की अनोखी शर्त
जब नौशाद ने टुन टुन की अभिनय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें परदे पर आज़माने की सलाह दी, तो टुन टुन ने एक स्पष्ट शर्त रख दी — उनकी पहली फिल्म दिलीप कुमार के साथ होनी चाहिए, जिनकी वह प्रबल प्रशंसक थीं। नौशाद और दिलीप कुमार की गहरी मित्रता काम आई, और यह इच्छा पूरी हुई।
साल 1950 में आई फिल्म 'बाबुल' में टुन टुन को दिलीप कुमार और नरगिस के साथ काम करने का अवसर मिला। इसी फिल्म के दौरान उनका नाम उमा देवी से बदलकर टुन टुन पड़ा — और यही नाम आगे चलकर उनकी स्थायी पहचान बन गया।
कॉमेडी की बेताज रानी: पाँच दशक, लगभग 200 फिल्में
'बाबुल' के बाद टुन टुन ने कॉमेडी किरदारों में जो जगह बनाई, वह अद्वितीय थी। उनकी मासूमियत, हाव-भाव और मज़ेदार संवाद-अदायगी दर्शकों के दिलों में उतर गई। उन्होंने गुरु दत्त की यादगार फिल्मों 'आर-पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55' और 'प्यासा' में काम किया। इसके अलावा 'नमक हलाल', 'कोहिनूर' सहित दर्जनों फिल्मों में उनकी कॉमेडी ने दर्शकों को भरपूर मनोरंजन दिया।
करीब पाँच दशक के करियर में टुन टुन ने लगभग 200 फिल्मों में काम किया — हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी। उस दौर के बड़े-बड़े सितारों के साथ उनकी जोड़ी इतनी लोकप्रिय हुई कि फिल्मकार उनके लिए खासतौर पर हास्य किरदार लिखवाने लगे।
अंतिम वर्ष और विरासत
पति अख्तर अब्बास काजी के निधन के बाद टुन टुन ने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली। उनकी आखिरी हिंदी फिल्म 1990 में आई 'कसम धंधे की' रही। लंबी बीमारी के बाद 23 नवंबर 2003 को मुंबई में 80 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन की विरासत आज भी उतनी ही जीवंत है — उनकी हँसी आज भी पुरानी फिल्मों में गूँजती है।