अमेरिकी सीनेट बिल में यूक्रेन को इंटेलिजेंस सहायता जारी रखने और भारत समेत इंडो-पैसिफिक साझेदारों से सहयोग बढ़ाने का प्रावधान
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी सीनेट की सेलेक्ट कमेटी ऑन इंटेलिजेंस ने 22 मई 2025 को वित्त वर्ष 2027 के लिए इंटेलिजेंस ऑथराइजेशन एक्ट (IAA) को संशोधनों के साथ मंजूरी दे दी। इस व्यापक बिल में यूक्रेन को अमेरिकी खुफिया सहायता निरंतर बनाए रखने, भारत सहित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साझेदार देशों के साथ सहयोग गहरा करने और चीन व रूस को लेकर बढ़ती सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) निर्यात पर निगरानी कड़ी करने के अहम प्रावधान शामिल हैं।
यूक्रेन को खुफिया सहायता: क्या है प्रावधान
बिल में यह अनिवार्य किया गया है कि अमेरिकी खुफिया समुदाय यूक्रेन में जारी युद्ध के दौरान 'महत्वपूर्ण खुफिया सहायता' बनाए रखे। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यदि भविष्य में कोई शांति समझौता होता है, तो भी इस सहायता को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाएगा — बल्कि परिस्थितियों के अनुसार इसे जारी रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त, यदि रूस किसी भावी शांति समझौते का उल्लंघन करता है, तो अमेरिका को पूर्ण खुफिया सहायता तत्काल बहाल करनी होगी।
समिति के अनुसार, इस प्रावधान का उद्देश्य किसी भी संभावित शांति प्रक्रिया के बाद यूक्रेन के साथ खुफिया सहयोग की निरंतरता को लेकर किसी भी तरह के भ्रम को दूर करना है। कोलोराडो के डेमोक्रेटिक सीनेटर माइकल बेनेट ने कहा, 'मैं लगातार उन संसाधनों और अधिकारों के लिए लड़ रहा हूं, जिनकी हमारे खुफिया कर्मियों को जरूरत है — इनमें हजारों कोलोराडो के लोग भी शामिल हैं, जो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करते हैं।'
बेनेट ने यह भी रेखांकित किया कि युद्ध के मैदान में यूक्रेन के प्रदर्शन ने यूरोप की रणनीतिक स्थिति को बदल दिया है। उनके अनुसार, अमेरिका और उसके सहयोगियों के निवेश की बदौलत यूक्रेन ने रूस की बढ़त को काफी हद तक रोका है और युद्ध लड़ने की ऐसी क्षमता विकसित की है जो नाटो के किसी भी सदस्य देश में नहीं देखी गई। उन्होंने कहा कि यूक्रेन की सेना अब इस स्थिति में है कि वह 'यूरोप में किसी भी भावी रूसी आक्रमण को रोकने और हराने के लिए अमेरिका और नाटो के प्रयासों में योगदान दे सके।'
भारत और इंडो-पैसिफिक साझेदारों के साथ सहयोग
बिल में डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस को निर्देश दिया गया है कि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रमुख सहयोगियों — ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड — के साथ खुफिया सहयोग को मजबूत करे। इसके साथ ही भारत और वियतनाम जैसे क्षेत्रीय साझेदारों को भी इस ढाँचे में शामिल किया गया है।
बिल के अनुसार, इस बढ़े हुए सहयोग का मकसद 'आक्रमण को रोकना, क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और गलतफहमियों या गलत आकलन के जोखिम को कम करना' है। यह ऐसे समय में आया है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य सक्रियता को लेकर अमेरिका की चिंताएँ लगातार गहरी हो रही हैं।
AI निर्यात पर सख्त निगरानी
बिल का एक महत्वपूर्ण प्रावधान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों पर केंद्रित है। इसके तहत यह अनिवार्य किया गया है कि जब भी कोई उन्नत AI तकनीक किसी विदेशी देश को निर्यात की जाए, या अमेरिकी सरकार किसी विदेशी सरकार के साथ AI समझौता करे, उससे पहले एक व्यापक आकलन किया जाए।
इस आकलन में संबंधित देश के एक्सपोर्ट कंट्रोल तंत्र, चीन और रूस जैसे विरोधी देशों से उसके संबंध और संवेदनशील तकनीक के गलत हाथों में पहुँचने की संभावना की जाँच की जाएगी। गौरतलब है कि यह प्रावधान ऐसे समय में आया है जब AI तकनीक के दोहरे उपयोग — नागरिक और सैन्य — को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो रही है।
अन्य प्रमुख प्रावधान
इस बिल में कई अन्य उपाय भी शामिल हैं। समिति की रिपोर्ट में खुफिया एजेंसियों को 'सतत इंटेलिजेंस डिप्लोमेसी' में निवेश को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा, विदेशी साइबर खतरों पर कड़ी निगरानी, गोपनीय जानकारी से जुड़े प्रेडिक्शन मार्केट्स में खुफिया कर्मचारियों की भागीदारी पर प्रतिबंध और अमेरिकी खुफिया व सैन्य ठिकानों के निकट विदेशी संबद्ध रियल एस्टेट डील्स की जाँच के प्रावधान भी शामिल हैं।
यह बिल अब पूर्ण सीनेट में मतदान के लिए आगे बढ़ेगा, जहाँ इसके पारित होने पर अमेरिकी खुफिया नीति की दिशा और स्पष्ट होगी।