अमेरिका-ईरान समझौते के बाद US सेंट्रल कमांड ने ईरानी पोर्ट्स की नाकाबंदी हटाई
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने 19 जून को घोषणा की कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद अमेरिकी सेना ने ईरानी पोर्ट्स और तटीय इलाकों में आने-जाने वाले सभी समुद्री ट्रैफिक पर लगी नाकाबंदी पूरी तरह हटा ली है। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ 14-सूत्रीय ज्ञापन समझौते की घोषणा के ठीक एक दिन बाद उठाया गया।
सेंट्रल कमांड का आधिकारिक बयान
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'अमेरिकी सेना ईरानी पोर्ट्स से आने-जाने वाले जहाजों की आवाजाही में रुकावट नहीं डाल रही है। अमेरिकी सेना की नाकाबंदी लागू करने की सभी कोशिशें रोक दी गई हैं।' कमांड ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी वॉरशिप फिलहाल सामान्य क्षेत्र में तैनात रहेंगे, ताकि समझौते की सभी शर्तों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
ट्रंप ने बताई समझौते की विस्तृत जानकारी
फ्रांस में आयोजित जी7 समिट के समापन पर राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार को इस समझौते का विस्तार से खुलासा किया। उन्होंने कहा, 'रविवार को हम ईरान के साथ एक समझौते पर पहुँचे, जिससे वह सब कुछ हासिल हो गया जिसे हमने लक्ष्य रखा था — मौजूदा संघर्ष को खत्म करना, होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना।' ट्रंप ने यह भी कहा कि यदि ईरान समझौते की शर्तें नहीं मानता, तो फिर से सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रहेगा।
14-सूत्रीय ज्ञापन समझौते में क्या है
अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने 14 प्वाइंट्स वाले ज्ञापन समझौते का ब्यौरा साझा किया। इसके तहत ईरान ने परमाणु हथियार न खरीदने और न विकसित करने का वादा किया है। इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट से कमर्शियल शिपिंग फिर से शुरू करने और अंतिम समझौते पर बातचीत के लिए 60 दिन का समय निर्धारित किया गया है। समझौते में प्रतिबंध में राहत को ईरान के नियमों के पालन से जोड़ा गया है और तेहरान के संवर्धित परमाणु सामग्री पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी का भी प्रावधान है।
व्यापक कूटनीतिक संदर्भ
गौरतलब है कि यह समझौता ऐसे समय में आया है जब मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर था और होर्मुज स्ट्रेट — जिससे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है — बंद होने की स्थिति में था। ट्रंप ने इसे पूरे मिडिल ईस्ट में एक बड़े कूटनीतिक पुनर्गठन का अवसर बताया है। यह ऐसी पहली औपचारिक अमेरिका-ईरान द्विपक्षीय सहमति है जो वर्षों की शत्रुता के बाद सामने आई है।
आगे क्या होगा
अब सभी की नज़रें 60 दिन की बातचीत की समयसीमा पर हैं, जिसके भीतर दोनों पक्षों को एक अंतिम और बाध्यकारी समझौते पर पहुँचना है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी भूमिका इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए निर्णायक मानी जा रही है।