19 अक्टूबर 2026
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रूसी ऊर्जा पर भारत-चीन को टैरिफ: अमेरिका को यूरोप का साथ नहीं मिला — बेसेंट

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रूसी ऊर्जा पर भारत-चीन को टैरिफ: अमेरिका को यूरोप का साथ नहीं मिला — बेसेंट

सारांश

अमेरिका ने भारत और चीन पर रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर सेकेंडरी टैरिफ लगाने में यूरोप का साथ माँगा — और यूरोप ने इनकार कर दिया। बेसेंट के यामल आँकड़े यूरोप की 'रूस से दूरी' की कहानी पर सवाल उठाते हैं। ट्रंप ने प्रतिबंध हटाए नहीं, केवल 60 दिनों के लिए रोके हैं।

मुख्य बातें

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने भारत और चीन पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने के लिए यूरोप से समर्थन माँगा, लेकिन यूरोप ने इनकार किया।
रूस की यामल परियोजना से इस वर्ष के पहले छह महीनों में भेजी गई 140 ऊर्जा खेपों में से 136 यूरोपीय देशों को गईं — कुल कीमत 8 अरब डॉलर से अधिक।
ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने स्पष्ट किया कि लिंडसे ग्राहम एक्ट के तहत सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देश भारत और चीन हो सकते हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने नए प्रतिबंध समाप्त नहीं किए — केवल 60 दिनों के लिए स्थगित किए हैं; मौजूदा प्रतिबंध जारी हैं।
वाशिंगटन यूक्रेन युद्ध और व्यापार मुद्दों पर बीजिंग के साथ अलग से बातचीत कर रहा है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 19 अक्टूबर 2026 को खुलासा किया कि वाशिंगटन ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों — विशेषकर भारत और चीन — पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने के लिए यूरोपीय सहयोगियों से समर्थन माँगा था, लेकिन यूरोप ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। एनबीसी के कार्यक्रम 'मीट द प्रेस' में दिए साक्षात्कार में बेसेंट ने ट्रंप प्रशासन की उस नीति का भी बचाव किया, जिसमें रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर नए प्रतिबंधों को फिलहाल स्थगित रखा गया है।

यूरोप पर बेसेंट का सीधा आरोप

बेसेंट ने कहा कि वसंत ऋतु में उन्होंने यूरोपीय सहयोगियों से चीन और भारत पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने में साथ देने का अनुरोध किया था, जिसे यूरोप ने ठुकरा दिया। उनका तर्क था, 'तो फिर इसका पूरा बोझ केवल अमेरिका ही क्यों उठाए?' उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय देश एक ओर रूस की आलोचना करते हैं और दूसरी ओर उससे ऊर्जा खरीदकर उसे आर्थिक रूप से मज़बूत कर रहे हैं।

यामल परियोजना के आँकड़े: यूरोप खरीद रहा है रूसी ऊर्जा

बेसेंट ने रूस की यामल ऊर्जा परियोजना का उदाहरण देते हुए बताया कि इस वर्ष के पहले छह महीनों में वहाँ से कुल 140 ऊर्जा खेप भेजी गईं, जिनमें से 136 खेप यूरोपीय देशों को गईं। इन खेपों की कुल अनुमानित कीमत 8 अरब डॉलर से अधिक बताई गई। इनके प्रमुख खरीदारों में बेल्जियम, स्पेन, फ्रांस और नीदरलैंड्स शामिल थे।

यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिका यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। गौरतलब है कि यूरोप ने 2022 के बाद रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने के दावे किए थे, लेकिन ये आँकड़े उस दावे पर सवाल उठाते हैं।

लिंडसे ग्राहम एक्ट: प्रतिबंध स्थगित, समाप्त नहीं

अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने सीएनएन के कार्यक्रम 'स्टेट ऑफ द यूनियन' में स्पष्ट किया कि लिंडसे ग्राहम एक्ट रूस पर सीधे प्रतिबंध लगाने के बारे में नहीं, बल्कि रूस के साथ व्यापार जारी रखने वाले देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने से संबंधित है। उन्होंने कहा, 'ऐसे देशों में सबसे महत्वपूर्ण दो नाम भारत और चीन हैं।' राइट ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन प्रतिबंधों को समाप्त नहीं किया है, केवल फिलहाल उन्हें लागू होने से रोका है।

बेसेंट ने जोर देकर कहा, 'शुक्रवार को कोई भी प्रतिबंध नहीं हटाया गया। बिल्कुल कोई प्रतिबंध नहीं हटाया गया।' उन्होंने स्पष्ट किया कि नए प्रतिबंधों को स्थगित करना और रूसी डीजल निर्यात पर कुछ राहत देना दो अलग-अलग कदम हैं। कानून में 60 दिनों की समीक्षा अवधि दी गई है।

रूसी डीजल पर राहत और चीन से बातचीत

ऊर्जा मंत्री राइट ने रूसी डीजल निर्यात को लेकर उठाए गए कदम का बचाव करते हुए कहा कि रूस को इसका लाभ तभी मिलेगा जब वह अपने सैन्य अभियान कम करेगा। उनके अनुसार, रूसी कच्चे तेल पर मौजूदा प्रतिबंध अभी भी लागू हैं और डीजल से जुड़ा निर्णय यूक्रेन युद्ध समाप्त करने की दिशा में प्रगति को प्रोत्साहित करने के लिए उठाया गया है। राइट ने यह भी बताया कि वाशिंगटन यूक्रेन युद्ध और दीर्घकालिक व्यापारिक संबंधों को लेकर बीजिंग के साथ बातचीत कर रहा है।

भारत और चीन पर असर: आगे क्या

भारत और चीन — जो रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदार हैं — लिंडसे ग्राहम एक्ट के तहत संभावित प्रतिबंधों की जद में आ सकते हैं, यदि 60 दिनों की समीक्षा अवधि के बाद ट्रंप प्रशासन इन्हें लागू करने का फैसला करता है। विश्लेषकों के अनुसार, यूरोप के असहयोग और अमेरिका की आंतरिक राजनीतिक जटिलताओं के बीच इस नीति का भविष्य अनिश्चित है। भारत की ऊर्जा आयात नीति और रूस के साथ उसके संबंध अगले कुछ हफ्तों में राजनयिक दबाव का केंद्र बन सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ये आँकड़े बताते हैं कि व्यवहार में बात अलग है। भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार है: एक तरफ सस्ती रूसी ऊर्जा की आर्थिक ज़रूरत, दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों का भावी जोखिम। 60 दिनों की समीक्षा अवधि असल में एक कूटनीतिक दबाव की खिड़की है — और भारत की ऊर्जा नीति इस दौरान वाशिंगटन की नज़र में रहेगी।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिका ने भारत और चीन पर किस तरह का टैरिफ लगाने की योजना बनाई थी?
अमेरिका ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों — खासकर भारत और चीन — पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने की योजना बनाई थी। इसके लिए वित्त मंत्री बेसेंट ने यूरोपीय देशों से साझा कार्रवाई का आग्रह किया, जिसे यूरोप ने अस्वीकार कर दिया।
लिंडसे ग्राहम एक्ट क्या है और इसका भारत पर क्या असर होगा?
लिंडसे ग्राहम एक्ट एक अमेरिकी कानून है जो रूस के साथ व्यापार जारी रखने वाले देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने का प्रावधान करता है। ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के अनुसार, इस कानून के तहत सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देश भारत और चीन हो सकते हैं। फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप ने इन प्रतिबंधों को 60 दिनों के लिए स्थगित किया है।
क्या ट्रंप ने रूस पर लगे प्रतिबंध हटा दिए हैं?
नहीं। बेसेंट ने स्पष्ट किया कि शुक्रवार को कोई भी प्रतिबंध नहीं हटाया गया। ट्रंप ने केवल नए प्रतिबंधों को 60 दिनों के लिए स्थगित किया है और रूसी डीजल निर्यात पर सीमित राहत दी है; रूस की बड़ी ऊर्जा कंपनियों पर मौजूदा प्रतिबंध अभी भी लागू हैं।
यूरोप ने अमेरिका के प्रस्ताव को क्यों अस्वीकार किया?
इसका कोई आधिकारिक यूरोपीय स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। हालाँकि बेसेंट के अनुसार, यूरोपीय देश स्वयं रूस की यामल परियोजना से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीद रहे हैं — इस वर्ष के पहले छह महीनों में 136 खेपें, जिनकी कीमत 8 अरब डॉलर से अधिक है — जिससे उनकी अपनी स्थिति नाजुक है।
रूसी ऊर्जा खरीद पर भारत की नीति क्या है?
भारत ने 2022 के बाद से रूसी कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिसे सरकार ऊर्जा सुरक्षा और किफ़ायती मूल्य के आधार पर उचित ठहराती है। भारत अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था के बाहर खरीद करता रहा है, लेकिन लिंडसे ग्राहम एक्ट की 60 दिनों की समीक्षा अवधि में यह नीति वाशिंगटन के कूटनीतिक दबाव में आ सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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