22 जुलाई 2026
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व्हाइट हाउस रिपोर्ट: R&D खर्च में चीन अमेरिका के बराबर, AI और क्वांटम में बढ़ती चुनौती

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व्हाइट हाउस रिपोर्ट: R&D खर्च में चीन अमेरिका के बराबर, AI और क्वांटम में बढ़ती चुनौती

सारांश

पहली बार अमेरिका को R&D खर्च में PPP-समायोजित आधार पर बराबरी का प्रतिस्पर्धी मिला है — और वह चीन है। व्हाइट हाउस की ताज़ा रिपोर्ट इसे शीत युद्ध जैसी चुनौती बताते हुए 200 अरब डॉलर के संघीय R&D तंत्र के पुनर्गठन का खाका पेश करती है।

मुख्य बातें

व्हाइट हाउस की रिपोर्ट 'साइंस: ए न्यू गोल्डन एज' के अनुसार, PPP-समायोजित आधार पर R&D खर्च में चीन पहली बार अमेरिका के बराबर पहुँच गया है।
पिछले बीस वर्षों में चीन का R&D निवेश नगण्य स्तर से बढ़कर अमेरिका के ~200 अरब डॉलर के संघीय R&D खर्च के समकक्ष हो गया है।
रिपोर्ट AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और स्पेस सिस्टम पर संघीय संसाधन केंद्रित करने की सिफारिश करती है।
3 अरब डॉलर से अधिक R&D बजट वाली संघीय एजेंसियों को 90 दिनों के भीतर कार्यान्वयन योजनाएँ जमा करनी होंगी।
रिपोर्ट में भारत या किसी भारतीय वैज्ञानिक संस्थान का कोई उल्लेख नहीं; भारत को किसी तकनीकी मिशन में संभावित भागीदार नहीं बताया गया।
इस प्रतिस्पर्धा की तुलना शीत युद्ध के दौर से की गई है और 1945 के बाद जैसे मूलभूत पुनर्गठन की आवश्यकता बताई गई है।

व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी ने 22 जुलाई को जारी एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में आगाह किया है कि रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) खर्च के मामले में चीन 'परचेजिंग पावर पैरिटी' (PPP) के आधार पर अमेरिका का बराबरी का प्रतिस्पर्धी बन चुका है। 'साइंस: ए न्यू गोल्डन एज' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट अमेरिका के लगभग 200 अरब डॉलर के संघीय R&D तंत्र को नए सिरे से व्यवस्थित करने का एक विस्तृत खाका प्रस्तुत करती है।

बीस वर्षों में पलटी बाज़ी

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले बीस वर्षों में चीन का R&D खर्च, जो कभी अमेरिका के मुकाबले नगण्य था, PPP-समायोजित आधार पर अब अमेरिका के समकक्ष पहुँच गया है। रिपोर्ट में शामिल एक चार्ट — जो अमेरिका, चीन और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ की तुलना करता है — में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 'पहली बार, अमेरिका को R&D खर्च में PPP-समायोजित आधार पर बराबरी का प्रतिस्पर्धी मिला है।' इस स्थिति की तुलना रिपोर्ट में शीत युद्ध के दौर से की गई है, जब सोवियत संघ की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं ने अमेरिकी विज्ञान नीति को नई दिशा दी थी।

बीजिंग की रणनीतिक बढ़त

दस्तावेज़ में रेखांकित किया गया है कि बीजिंग ने वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता को अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धी रणनीति के केंद्र में रखा है। सर्वोच्च स्तर पर नीति-निर्माण और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान प्रयासों के समन्वय के ज़रिए चीन ने बुनियादी वैज्ञानिक शोध के लिए संसाधन जुटाए हैं और राष्ट्रीय हित की प्रमुख तकनीकों में तेज़ी से प्रगति की है। रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि स्वायत्त वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के क्षेत्र में — जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स प्रयोगों को डिज़ाइन व संचालित करने में सहायता करते हैं — चीन और कनाडा जैसे देश अमेरिका से आगे निकल रहे हैं।

अमेरिकी प्राथमिकताएँ और संघीय एजेंडा

व्हाइट हाउस का यह खाका आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, न्यूक्लियर फिशन व फ़्यूजन, एडवांस्ड कम्युनिकेशन, रोबोटिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और स्पेस सिस्टम पर संघीय संसाधन केंद्रित करने की सिफारिश करता है। जिन संघीय एजेंसियों के पास वित्त वर्ष 2026 में R&D बजट के लिए कम से कम 3 अरब डॉलर की मंजूरी है, उन्हें 90 दिनों के भीतर कार्यान्वयन योजनाएँ प्रस्तुत करनी होंगी और वित्त वर्ष 2028 के बजट प्रस्तावों में व्हाइट हाउस की प्राथमिकताओं को शामिल करना होगा।

वैश्विक संदर्भ और ऐतिहासिक सबक

रिपोर्ट में अन्य देशों के उदाहरणों से सीख लेने की बात कही गई है। यूनाइटेड किंगडम को 2024 में एक 'मेटासाइंस यूनिट' स्थापित कर अपने विज्ञान-फंडिंग तंत्र को पुनर्गठित करने का श्रेय दिया गया है। नॉर्वे का उदाहरण पोर्टफोलियो-आधारित अनुसंधान वित्तपोषण के मॉडल के रूप में दिया गया है। गौरतलब है कि 1980 के दशक में जापानी निर्माताओं द्वारा वैश्विक मेमोरी-चिप बाज़ार पर कब्ज़े की चुनौती के जवाब में 1987 में सेमाटेक कंसोर्टियम की स्थापना की गई थी — रिपोर्ट इसे एक मिसाल के रूप में उद्धृत करती है। दस्तावेज़ आगाह करता है कि अमेरिका में हुई खोजों का औद्योगिक लाभ अक्सर अन्य देशों को मिला है।

भारत की अनुपस्थिति

उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट में भारत या किसी भारतीय वैज्ञानिक संस्थान का कोई उल्लेख नहीं है। दस्तावेज़ में वर्णित किसी भी राष्ट्रीय तकनीकी मिशन में भारत को संभावित भागीदार के रूप में नहीं पहचाना गया है। यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब भारत वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। साथ जारी वित्त वर्ष 2028 के मेमोरेंडम में 'अंतरराष्ट्रीय भागीदारों' के साथ लागत-साझाकरण का उल्लेख है, लेकिन किसी देश का नाम नहीं लिया गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक स्वीकारोक्ति है — कि दशकों की तकनीकी बढ़त अब निर्विवाद नहीं रही। परंतु विडंबना यह है कि जिस समय यह रिपोर्ट जारी हुई, उसी दौर में अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विदेशी शोधकर्ताओं के वीज़ा पर अनिश्चितता और संघीय विज्ञान एजेंसियों के बजट में कटौती की खबरें भी सामने आ रही हैं। 90-दिन की कार्यान्वयन समयसीमा महत्वाकांक्षी लगती है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि क्या बजट आवंटन इन प्राथमिकताओं के अनुरूप होगा। भारत के लिए यह रिपोर्ट एक संकेत है — वैश्विक तकनीकी पुनर्संरेखण में उसकी अनुपस्थिति चिंताजनक है।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्हाइट हाउस की 'साइंस: ए न्यू गोल्डन एज' रिपोर्ट क्या है?
यह व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी द्वारा 22 जुलाई को जारी एक नीतिगत दस्तावेज़ है, जो अमेरिका के लगभग 200 अरब डॉलर के संघीय R&D तंत्र को पुनर्गठित करने का खाका प्रस्तुत करता है। इसमें चीन को पहली बार PPP-समायोजित आधार पर R&D खर्च में बराबरी का प्रतिस्पर्धी घोषित किया गया है।
चीन कब से अमेरिका के बराबर R&D खर्च करने लगा?
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले बीस वर्षों में चीन का R&D खर्च नगण्य स्तर से बढ़कर PPP-समायोजित आधार पर अमेरिका के समकक्ष हो गया है। यह बदलाव बीजिंग की सुनियोजित राष्ट्रीय रणनीति और सर्वोच्च स्तर पर समन्वित नीति-निर्माण का परिणाम बताया गया है।
अमेरिका किन तकनीकी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है?
रिपोर्ट AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, न्यूक्लियर फिशन व फ़्यूजन, एडवांस्ड कम्युनिकेशन, रोबोटिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और स्पेस सिस्टम पर संघीय संसाधन केंद्रित करने की सिफारिश करती है। 3 अरब डॉलर से अधिक R&D बजट वाली एजेंसियों को 90 दिनों में कार्यान्वयन योजनाएँ देनी होंगी।
इस रिपोर्ट में भारत का उल्लेख क्यों नहीं है?
रिपोर्ट में भारत या किसी भारतीय वैज्ञानिक संस्थान का कोई उल्लेख नहीं किया गया है और न ही किसी तकनीकी मिशन में भारत को संभावित भागीदार बताया गया है। हालाँकि साथ जारी वित्त वर्ष 2028 के मेमोरेंडम में 'अंतरराष्ट्रीय भागीदारों' के साथ लागत-साझाकरण का उल्लेख है, लेकिन किसी देश का नाम नहीं लिया गया।
रिपोर्ट में शीत युद्ध से तुलना क्यों की गई है?
रिपोर्ट इस प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध जैसी भू-राजनीतिक चुनौती मानती है, जब सोवियत संघ की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं ने अमेरिकी विज्ञान नीति को पुनर्गठित करने पर मजबूर किया था। इसमें 1945 के बाद जैसे मूलभूत बदलाव की आवश्यकता बताई गई है, क्योंकि AI के उदय और चीन की बराबरी ने पुरानी व्यवस्था को अपर्याप्त बना दिया है।
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