4 साल में 111 सांसद-विधायकों ने बदले दल, नागालैंड में सर्वाधिक 32 मामले: ADR रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से 2026 के बीच लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित होने के बाद 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने राजनीतिक दल बदले। सबसे अधिक दलबदल नागालैंड में दर्ज किया गया, जहाँ 32 विधानसभा सदस्यों ने चुनावी जीत के बाद अपनी पार्टी छोड़ दी।
मुख्य आँकड़े और राज्यवार स्थिति
ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच ने इन 111 प्रतिनिधियों के शपथपत्रों का विश्लेषण किया। इनमें 26 लोकसभा सदस्य, 7 राज्यसभा सदस्य और 78 विधानसभा सदस्य शामिल हैं।
राज्यवार आँकड़ों के अनुसार, नागालैंड में 32 और पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए। तेलंगाना में 9, गोवा में 8, मेघालय में 6, मणिपुर में 5, अरुणाचल प्रदेश और गुजरात में 4-4, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में 2-2, जबकि पंजाब में भी 2 मामले दर्ज हैं। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में प्रत्येक 1 विधायक ने दल बदला।
इसके अलावा, दिल्ली से राज्यसभा के 1 सदस्य और महाराष्ट्र से लोकसभा के 6 सदस्य जीत के बाद दूसरे दलों में सम्मिलित हुए।
किन दलों के सबसे अधिक प्रतिनिधि गए और किन में आए
दलबदल के मामले में एनडीपीपी (Nationalist Democratic Progressive Party) से सर्वाधिक 25 प्रतिनिधि बाहर गए। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस (AITC) के 20 और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 19 प्रतिनिधियों ने अपना दल छोड़ा। भारत राष्ट्र समिति (BRS) के 9, आम आदमी पार्टी (AAP) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के 7-7, तथा शिवसेना (UBT) के 6 प्रतिनिधियों ने भी दल बदला। जनता दल (यूनाइटेड) के 5 और एनपीपी के 4 प्रतिनिधि भी इस सूची में शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दल बदलने वाले कुल 111 प्रतिनिधियों में से 58 प्रतिशत यानी 64 प्रतिनिधि मूलतः एनडीपीपी, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस से थे।
नए दलों में शामिल होने के लिहाज़ से नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) में सबसे अधिक 32 प्रतिनिधि आए। भारतीय जनता पार्टी (BJP) में 29, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (I) में 20, कांग्रेस में 9, शिवसेना में 8, एनपीपी में 6 और पीपीए में 4 प्रतिनिधि शामिल हुए।
लोकतंत्र पर असर और पृष्ठभूमि
ADR की रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि हाल के वर्षों में कुछ राज्य विधानसभाओं में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि विधायकों ने सत्तारूढ़ दल छोड़ दिया। यह ऐसे समय में आया है जब दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं।
गौरतलब है कि भारत में 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल विरोधी कानून लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता रोकना था। इसके बावजूद, विभिन्न कानूनी खामियों और विलय के प्रावधानों का उपयोग करके दलबदल जारी रहता है।
आगे क्या
ADR की यह रिपोर्ट 24 सितंबर 2026 को जारी की गई है, और इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बहस को नई दिशा देने वाला दस्तावेज़ माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दसवीं अनुसूची में संशोधन अथवा अयोग्यता याचिकाओं के त्वरित निपटारे की व्यवस्था किए बिना दलबदल पर प्रभावी अंकुश लगाना कठिन होगा।