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तृणमूल कांग्रेस में गहरा संकट: 58 विधायक और 20 सांसद बागी, सुखेंदु शेखर रॉय ने दिया इस्तीफा

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तृणमूल कांग्रेस में गहरा संकट: 58 विधायक और 20 सांसद बागी, सुखेंदु शेखर रॉय ने दिया इस्तीफा

सारांश

तृणमूल कांग्रेस के 58 विधायक और 20 सांसद खुद को 'असली TMC' बताते हुए अलग मान्यता माँग रहे हैं। सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे और काकोली घोष दस्तीदार की बगावत ने यह साफ कर दिया है कि ममता बनर्जी की पार्टी में दरारें अब छुपाए नहीं छुप रहीं।

मुख्य बातें

तृणमूल कांग्रेस के 80 में से 58 विधायकों ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में खुद को 'असली TMC' के रूप में मान्यता देने की माँग की है।
पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय में इसी तरह का दावा पेश किए जाने की खबर है।
वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय (77 वर्ष) ने सोमवार को राज्यसभा सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफे की घोषणा की; उनका कार्यकाल 2029 तक था।
असंतुष्ट सांसदों को कथित तौर पर काकोली घोष दस्तीदार ने संगठित किया, जिन्हें पहले चीफ व्हिप पद से हटाया गया था।
अंतिम निर्णय चुनाव आयोग (ECI) और संबंधित पीठासीन अधिकारियों को करना है।
आलोचकों ने इस संकट की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP की टूट से की है।

तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। 8 जून 2026 को सामने आई ताज़ा घटनाओं के अनुसार, पार्टी के 80 निर्वाचित विधायकों में से 58 विधायकों के एक धड़े ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में खुद को 'असली तृणमूल कांग्रेस' के रूप में मान्यता देने की माँग की है। इसके करीब पाँच दिन बाद, पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय में इसी तरह का दावा पेश किए जाने की खबर है।

मुख्य घटनाक्रम

पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय (77 वर्ष) ने सोमवार को राज्यसभा सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की। उनका कार्यकाल 2029 तक था। रॉय पहले से ही पार्टी नेतृत्व के निशाने पर थे — उन्होंने अगस्त 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में प्रशिक्षु डॉक्टर के दुष्कर्म और हत्या मामले में न्याय की माँग कर रहे प्रदर्शनकारियों का खुलकर समर्थन किया था। विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों पर भी पार्टी नेतृत्व की सार्वजनिक आलोचना की थी।

कोलकाता में बागी विधायकों का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी ने किया, जबकि नई दिल्ली में असंतुष्ट सांसदों के गुट को कथित तौर पर काकोली घोष दस्तीदार ने संगठित किया।

काकोली घोष दस्तीदार की भूमिका

66 वर्षीय चिकित्सक और सांसद काकोली घोष दस्तीदार को पार्टी के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) पद से हटाया गया था, जिसके बाद उन्होंने संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। खबर है कि उन्होंने बागी सांसदों की सूची लोकसभा अध्यक्ष को सौंपते हुए उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) समर्थित अलग समूह के रूप में मान्यता देने की माँग की है। सूत्रों के अनुसार उनका तर्क है कि उन्हें चीफ व्हिप पद से हटाने की आधिकारिक सूचना अभी तक लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को नहीं मिली है, इसलिए तकनीकी रूप से वह अभी भी इस पद पर बनी हुई हैं।

नेतृत्व पर सवाल और संगठनात्मक कमज़ोरी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी अब पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन से पहले की तुलना में अधिक दूर नजर आ रही हैं। संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर पेशेवर सलाहकारों पर अत्यधिक निर्भर रहने का आरोप लगाया जा रहा है, जिनकी रणनीतियाँ अक्सर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति से मेल नहीं खातीं। यह ऐसे समय में आया है जब संदेशखाली विवाद, आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामला, भ्रष्टाचार के आरोप और हालिया हस्ताक्षर विवाद जैसे घटनाक्रमों ने पार्टी की साख को लगातार नुकसान पहुँचाया है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से एक, बशीरहाट सीट, तृणमूल सांसद के निधन के बाद फिलहाल रिक्त है।

शिवसेना-NCP से तुलना

मौजूदा घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई टूट से की जा रही है, जहाँ अलग हुए गुटों ने खुद को 'असली पार्टी' के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। आलोचकों का कहना है कि जिस तरह वाम मोर्चा सरकार भ्रष्टाचार, अहंकार और जनता से दूरी के आरोपों के कारण 34 वर्षों के शासन के बाद सत्ता से बाहर हुई थी, उसी तरह तृणमूल कांग्रेस भी अब वैसी ही चुनौतियों का सामना करती दिख रही है।

आगे क्या होगा

अंतिम फैसला चुनाव आयोग (ECI) और संसद व विधानसभा के संबंधित पीठासीन अधिकारियों को करना है। 28 वर्ष पहले ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस फिलहाल गहरे संगठनात्मक संकट में घिरी दिखाई दे रही है, और यह संकट आने वाले दिनों में और गहरा हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस राजनीतिक मॉडल का संरचनात्मक पतन है जो एक व्यक्ति की करिश्माई छवि पर टिका था। शिवसेना और NCP की टूट से सबक न लेना महँगा पड़ रहा है — वहाँ भी 'असली पार्टी' के दावों ने संस्थापक नेता को कमज़ोर किया था। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बगावत केवल हारे हुए नेताओं की नहीं, बल्कि दशकों से पार्टी की रीढ़ रहे वरिष्ठ सांसदों और विधायकों की है। अभिषेक बनर्जी की 'प्रोफेशनल सलाहकार' वाली रणनीति और ममता बनर्जी की जमीन से बढ़ती दूरी — दोनों मिलकर वही स्थिति पैदा कर रहे हैं जो 2011 से पहले वाम मोर्चे ने की थी।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तृणमूल कांग्रेस में मौजूदा बगावत क्या है?
पार्टी के 80 में से 58 विधायकों और 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने खुद को 'असली तृणमूल कांग्रेस' बताते हुए अलग मान्यता माँगी है। यह बगावत विधानसभा चुनाव में हार, भ्रष्टाचार के आरोपों और नेतृत्व से असंतोष के बाद सामने आई है।
सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफा क्यों दिया?
सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफे की घोषणा की। वह अगस्त 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने और भ्रष्टाचार पर पार्टी नेतृत्व की सार्वजनिक आलोचना करने के कारण पहले से ही नेतृत्व के निशाने पर थे।
काकोली घोष दस्तीदार की भूमिका क्या है?
काकोली घोष दस्तीदार को पार्टी के चीफ व्हिप पद से हटाया गया था, जिसके बाद उन्होंने संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। कथित तौर पर उन्होंने बागी सांसदों की सूची लोकसभा अध्यक्ष को सौंपते हुए उन्हें NDA समर्थित अलग समूह के रूप में मान्यता देने की माँग की है।
इस बगावत का अंतिम फैसला कौन करेगा?
पार्टी की मान्यता और विधायकों-सांसदों की सदस्यता का अंतिम फैसला चुनाव आयोग (ECI) और संसद व विधानसभा के संबंधित पीठासीन अधिकारियों को करना है। यह प्रक्रिया शिवसेना और NCP मामलों की तरह लंबी कानूनी लड़ाई में बदल सकती है।
क्या TMC की स्थिति पहले भी ऐसी हुई है?
नहीं, 1998 में ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस के इतिहास में यह सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट बताया जा रहा है। आलोचक इसकी तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP की टूट से कर रहे हैं, जहाँ अलग हुए गुटों ने 'असली पार्टी' का दावा किया था।
राष्ट्र प्रेस
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