तृणमूल कांग्रेस में गहरा संकट: 58 विधायक और 20 सांसद बागी, सुखेंदु शेखर रॉय ने दिया इस्तीफा
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। 8 जून 2026 को सामने आई ताज़ा घटनाओं के अनुसार, पार्टी के 80 निर्वाचित विधायकों में से 58 विधायकों के एक धड़े ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में खुद को 'असली तृणमूल कांग्रेस' के रूप में मान्यता देने की माँग की है। इसके करीब पाँच दिन बाद, पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय में इसी तरह का दावा पेश किए जाने की खबर है।
मुख्य घटनाक्रम
पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय (77 वर्ष) ने सोमवार को राज्यसभा सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की। उनका कार्यकाल 2029 तक था। रॉय पहले से ही पार्टी नेतृत्व के निशाने पर थे — उन्होंने अगस्त 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में प्रशिक्षु डॉक्टर के दुष्कर्म और हत्या मामले में न्याय की माँग कर रहे प्रदर्शनकारियों का खुलकर समर्थन किया था। विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों पर भी पार्टी नेतृत्व की सार्वजनिक आलोचना की थी।
कोलकाता में बागी विधायकों का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी ने किया, जबकि नई दिल्ली में असंतुष्ट सांसदों के गुट को कथित तौर पर काकोली घोष दस्तीदार ने संगठित किया।
काकोली घोष दस्तीदार की भूमिका
66 वर्षीय चिकित्सक और सांसद काकोली घोष दस्तीदार को पार्टी के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) पद से हटाया गया था, जिसके बाद उन्होंने संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। खबर है कि उन्होंने बागी सांसदों की सूची लोकसभा अध्यक्ष को सौंपते हुए उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) समर्थित अलग समूह के रूप में मान्यता देने की माँग की है। सूत्रों के अनुसार उनका तर्क है कि उन्हें चीफ व्हिप पद से हटाने की आधिकारिक सूचना अभी तक लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को नहीं मिली है, इसलिए तकनीकी रूप से वह अभी भी इस पद पर बनी हुई हैं।
नेतृत्व पर सवाल और संगठनात्मक कमज़ोरी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी अब पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन से पहले की तुलना में अधिक दूर नजर आ रही हैं। संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर पेशेवर सलाहकारों पर अत्यधिक निर्भर रहने का आरोप लगाया जा रहा है, जिनकी रणनीतियाँ अक्सर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति से मेल नहीं खातीं। यह ऐसे समय में आया है जब संदेशखाली विवाद, आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामला, भ्रष्टाचार के आरोप और हालिया हस्ताक्षर विवाद जैसे घटनाक्रमों ने पार्टी की साख को लगातार नुकसान पहुँचाया है।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से एक, बशीरहाट सीट, तृणमूल सांसद के निधन के बाद फिलहाल रिक्त है।
शिवसेना-NCP से तुलना
मौजूदा घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई टूट से की जा रही है, जहाँ अलग हुए गुटों ने खुद को 'असली पार्टी' के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। आलोचकों का कहना है कि जिस तरह वाम मोर्चा सरकार भ्रष्टाचार, अहंकार और जनता से दूरी के आरोपों के कारण 34 वर्षों के शासन के बाद सत्ता से बाहर हुई थी, उसी तरह तृणमूल कांग्रेस भी अब वैसी ही चुनौतियों का सामना करती दिख रही है।
आगे क्या होगा
अंतिम फैसला चुनाव आयोग (ECI) और संसद व विधानसभा के संबंधित पीठासीन अधिकारियों को करना है। 28 वर्ष पहले ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस फिलहाल गहरे संगठनात्मक संकट में घिरी दिखाई दे रही है, और यह संकट आने वाले दिनों में और गहरा हो सकता है।