तृणमूल कांग्रेस में टूट पर शशि थरूर: '20 सांसदों का एनडीए से जुड़ना बिना सिद्धांतों की राजनीति'
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने 19 जून को तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुई बड़ी टूट पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। थरूर ने कहा कि इस विभाजन के पीछे 'लालच, फायदे या धमकियाँ' जैसे कारण रहे होंगे, और यह सब केवल सत्ताधारी पक्ष ही कर सकता है क्योंकि 'ताकत उन्हीं के पास है।' उन्होंने इसे भारतीय राजनीति के सिद्धांतहीन होते जाने का प्रमाण बताया।
मुख्य घटनाक्रम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा और पार्टी मात्र 80 सीटें ही जीत सकी। इसके तुरंत बाद पार्टी के भीतर विद्रोह की आँधी आई। सबसे पहले 58 विधायकों ने बगावत का झंडा उठाया और विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में सोवनदेब चट्टोपाध्याय को मान्यता देने से इनकार कर दिया।
इसके बाद संसद में भी संकट गहराया। तीन राज्यसभा सांसदों ने इस्तीफा दे दिया, जबकि 20 लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी में शामिल होकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की घोषणा की।
थरूर का सीधा आरोप
थरूर ने इन बागी सांसदों पर निशाना साधते हुए कहा, "जो सबसे बड़ा गुट अलग हुआ — यानी तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद — उन्होंने खुलकर कहा है कि वे अब एनडीए के साथ जुड़ेंगे। ये वही सांसद हैं जो पिछले 12 सालों से एनडीए पर हमले करते रहे हैं। ऐसे में अचानक उनमें यह 'गुण' दिखना बताता है कि हमारे देश की राजनीति बिना सिद्धांतों वाली राजनीति हो गई है और यह काफी दुखद है।"
राजनीति में विजन की ज़रूरत
थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनकी सीमा होनी चाहिए। उन्होंने कहा, "दूसरी तरफ वाले आपके दुश्मन नहीं हैं — वे आपके विरोधी हैं। आपका काम देश के सामूहिक हित के लिए काम करना है।" उनके अनुसार राजनीति में टिके रहने का एकमात्र तर्क यह होना चाहिए कि आपके पास भारत और समाज को बेहतर बनाने का एक स्पष्ट विजन हो।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस में यह टूट महज आंतरिक असंतोष नहीं, बल्कि चुनावी हार के बाद उभरी सत्ता-खिंचाव की राजनीति का नतीजा है। आलोचकों का कहना है कि जब कोई पार्टी कमज़ोर पड़ती है, तो सत्ताधारी गठबंधन के लिए उसके नेताओं को अपनी ओर खींचना आसान हो जाता है। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी एकता पर पहले से ही सवाल उठाए जा रहे हैं।
आगे की राह
तृणमूल कांग्रेस के शेष नेतृत्व के सामने अब पार्टी को पुनर्गठित करने की बड़ी चुनौती है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में विपक्ष की भूमिका अब अनिश्चित हो गई है। थरूर की यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि विपक्षी दलों में भी इस घटनाक्रम को लेकर गहरी चिंता है।