टीएमसी में विद्रोह की आहट: निरुपम का दावा — 22 बागी सांसद एनडीए में होंगे शामिल
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रवक्ता संजय निरुपम ने 14 जून 2026 को मुंबई में दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष इतना गहरा हो चुका है कि लगभग 22 सांसदों का एक समूह शीघ्र ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का दामन थाम सकता है। निरुपम के अनुसार, पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की नेतृत्व शैली के कारण सांसदों और विधायकों में नाराज़गी लगातार बढ़ रही है।
मुख्य दावे और घटनाक्रम
निरुपम ने कहा कि पहले अनुमान था कि टीएमसी के बागी सांसदों की संख्या 18 या 19 से अधिक नहीं होगी, लेकिन नए राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद यह आँकड़ा बदलता दिख रहा है। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में इस विषय पर बैठकों का दौर जारी है और आने वाले दिनों में ये सांसद भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विधिवत शामिल होंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि टीएमसी में जो स्थिति उभर रही है, वह सामान्य संगठनात्मक असंतोष नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक दरार का संकेत है। नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की कमी को उन्होंने इस संकट की मूल वजह बताया।
उद्धव ठाकरे गुट पर भी निशाना
निरुपम ने शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता उद्धव ठाकरे पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि ठाकरे चाहे जितनी बैठकें अपने सांसदों के साथ कर लें, उनकी पार्टी के भीतर भी असंतोष की लहर पनप रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी जैसी ही स्थिति उद्धव गुट में भी देखने को मिल सकती है।
इंडिया गठबंधन पर सवाल
शिवसेना प्रवक्ता ने विपक्षी इंडिया गठबंधन की एकजुटता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस और वाम दलों के बीच कई राज्यों में, विशेषकर केरल में, राजनीतिक टकराव लंबे समय से जारी है। निरुपम के अनुसार, गठबंधन वैचारिक एकता के बजाय केवल राजनीतिक अवसरवाद पर टिका है, जिसके कारण घटक दल अलग-अलग मुद्दों पर एक-दूसरे के विरुद्ध बयानबाजी करते नज़र आते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यह स्थिति दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ नहीं है और आने वाले समय में इंडिया गठबंधन और अधिक बिखर सकता है।
राजनीतिक संदर्भ
गौरतलब है कि यह दावे ऐसे समय में आए हैं जब एनडीए और विपक्षी गठबंधन के बीच संसदीय ताकत को लेकर सियासी हलचल तेज़ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के दावे अक्सर राजनीतिक दबाव की रणनीति के रूप में भी सामने आते हैं और इनकी पुष्टि तब तक नहीं मानी जा सकती जब तक कि संबंधित सांसद स्वयं सार्वजनिक रूप से अपना रुख स्पष्ट न करें। टीएमसी की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या निरुपम के दावे ज़मीनी राजनीतिक हकीकत में तब्दील होते हैं या यह केवल सत्तारूढ़ गठबंधन की बयानबाज़ी तक सीमित रहते हैं।