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लखनऊ में 'अखिलेश के माफिया' पोस्टर से सियासत गरमाई, सपा बोली — भाजपा ध्यान भटका रही है

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लखनऊ में 'अखिलेश के माफिया' पोस्टर से सियासत गरमाई, सपा बोली — भाजपा ध्यान भटका रही है

सारांश

लखनऊ के गोमती नगर में 'अखिलेश के माफिया' पोस्टर से एक बार फिर UP की राजनीति उबाल पर है। सपा ने इसे चुनावी ध्यान भटकाव बताया तो भाजपा ने सपा काल को माफिया राज करार दिया — और यह जंग असल में 2027 विधानसभा चुनाव की पहली झड़प है।

मुख्य बातें

लखनऊ के गोमती नगर में 21 सितंबर 2026 को 'अखिलेश के माफिया, माफिया के अखिलेश' पोस्टर लगा, जिसमें अतीक अहमद, आजम खान और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें थीं।
पोस्टर में जौहर यूनिवर्सिटी में जमीन कब्जे के मामले का भी उल्लेख किया गया है।
सपा विधायक मनोज पारस ने इसे भाजपा की विभाजनकारी राजनीति और ध्यान भटकाने की कोशिश बताया।
कांग्रेस नेता तारिक हमीद कर्रा ने आरोप लगाया कि भाजपा राहुल गांधी और अखिलेश यादव को पहलगाम उग्रवाद से जोड़ रही है।
यूपी राज्यमंत्री दानिश आजाद ने सपा के 2012–2017 के कार्यकाल को अपराध-समर्थक और सुरक्षा-विफल बताया।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमती नगर इलाके में समाजवादी पार्टी (सपा) के खिलाफ एक विवादास्पद पोस्टर लगाए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति एक बार फिर तीखी हो गई है। पोस्टर में कथित तौर पर अतीक अहमद, आजम खान और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें हैं और उस पर लिखा है — 'अखिलेश के माफिया, माफिया के अखिलेश'। इसमें जौहर यूनिवर्सिटी में जमीन कब्जे के मामले का भी उल्लेख है, जिसमें कथित रूप से माफिया तत्वों की संलिप्तता बताई गई है।

पोस्टर का विवाद और सियासी तस्वीर

यह पोस्टर 21 सितंबर 2026 को सामने आया और देखते ही देखते उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया मोर्चा खुल गया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पोस्टर पर लिखी बातों का समर्थन करते हुए सपा के कार्यकाल को 'माफिया राज' करार दिया। वहीं सपा ने इसे सत्तारूढ़ दल की ध्यान भटकाने की रणनीति बताया।

सपा का पलटवार

सपा विधायक मनोज पारस ने पोस्टर पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'भारतीय जनता पार्टी पहली बार ऐसे पोस्टर नहीं लगा रही है। लोगों को हिंदू और मुसलमान में बांटने के बाद, वे और बंटवारा करना चाहते हैं और ये पोस्टर उसी का हिस्सा हैं। हालांकि, जनता इससे तंग आ चुकी है। लोगों को समझ आ गया है कि इन मुद्दों का इस्तेमाल सिर्फ उनका ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है।' गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ अभी से शुरू हो चुकी हैं और दोनों दलों के बीच शाब्दिक संघर्ष तेज़ है।

कांग्रेस का भी हमला

जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने भी भाजपा पर तीखा निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राहुल गांधी और अखिलेश यादव को पहलगाम के उग्रवादियों से जोड़ रही है। कर्रा ने कहा, 'इससे पहले उनको अपना इतिहास याद करना चाहिए। क्या ये वही लोग नहीं हैं जिनके समय में एनडीए सरकार यानी भाजपा ने कंधार में घुटने टेक दिए थे? क्या ये वही लोग नहीं हैं जिन्होंने आजादी से पहले दो-राष्ट्र सिद्धांत को बढ़ावा दिया था? और क्या ये वही लोग नहीं हैं जिन्होंने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकारें बनाई थीं।'

भाजपा का पक्ष

उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री दानिश आजाद ने सपा के 2012 से 2017 के कार्यकाल पर हमला बोलते हुए कहा, 'सपा ने प्रदेश के विकास के लिए काम करने के बजाय अपराधियों को बढ़ावा देने का काम किया। सुरक्षा व्यवस्था बदहाल थी, महिला अपराध के मामले भी बढ़ गए थे। उत्तर प्रदेश के थानों को सपा ने अपराधियों के हाथों में सौंप दिया था।' भाजपा का यह बयान उसी आक्रामक चुनावी कथानक का हिस्सा है जिसे वह पिछले कई महीनों से लगातार दोहरा रही है।

आगे क्या

यह विवाद महज़ एक पोस्टर तक सीमित नहीं रहा — यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराध, सांप्रदायिकता और विकास के मुद्दों पर दो बड़े दलों के बीच जारी व्यापक टकराव की एक कड़ी है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे पोस्टर चुनावी माहौल बनाने के औज़ार हैं, जबकि भाजपा इसे जनता को 'तथ्य बताने' की कोशिश बताती है। आने वाले हफ्तों में इस मुद्दे पर दोनों दलों की रणनीति और तेज़ होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि सपा 'ध्यान भटकाव' की काउंटर-फ्रेमिंग से महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर वापस आना चाहती है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वह यह है कि इस तरह के पोस्टर अभियान अक्सर जमीनी संगठन की कमजोरी को छुपाने के लिए इस्तेमाल होते हैं — जब नीतिगत उपलब्धियाँ कम चर्चित हों तो भावनात्मक ध्रुवीकरण ज़्यादा काम आता है। जनता की असली परीक्षा यही होगी कि क्या ये पोस्टर-युद्ध उन्हें मतदान केंद्र तक ले जाते हैं — या वे इससे ऊब चुके हैं, जैसा सपा विधायक मनोज पारस का दावा है।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लखनऊ में 'अखिलेश के माफिया' पोस्टर विवाद क्या है?
लखनऊ के गोमती नगर इलाके में 21 सितंबर 2026 को एक पोस्टर लगाया गया जिस पर अतीक अहमद, आजम खान और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें थीं और लिखा था 'अखिलेश के माफिया, माफिया के अखिलेश'। इस पोस्टर में जौहर यूनिवर्सिटी जमीन कब्जा मामले का भी जिक्र था।
समाजवादी पार्टी ने पोस्टर पर क्या कहा?
सपा विधायक मनोज पारस ने इसे भाजपा की विभाजनकारी और ध्यान भटकाने वाली राजनीति बताया। उन्होंने कहा कि जनता अब इन हथकंडों से तंग आ चुकी है और समझ चुकी है कि इन मुद्दों का इस्तेमाल असली समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए हो रहा है।
भाजपा ने पोस्टर विवाद पर क्या रुख अपनाया?
यूपी राज्यमंत्री दानिश आजाद ने सपा के 2012 से 2017 के कार्यकाल को अपराधियों का संरक्षणदाता बताया। उन्होंने कहा कि सपा शासन में सुरक्षा व्यवस्था चरमराई थी और प्रदेश के थाने अपराधियों के हाथ में थे।
कांग्रेस ने इस विवाद में क्या भूमिका निभाई?
जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने आरोप लगाया कि भाजपा राहुल गांधी और अखिलेश यादव को पहलगाम उग्रवादियों से जोड़ रही है। कर्रा ने भाजपा के इतिहास पर भी सवाल उठाए और कंधार विमान अपहरण प्रकरण का हवाला दिया।
यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण है?
2027 विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में यह पोस्टर-युद्ध भाजपा और सपा के बीच आख्यान की लड़ाई का हिस्सा है। भाजपा 'माफिया बनाम सुशासन' फ्रेम को मजबूत करना चाहती है, जबकि सपा महंगाई और बेरोजगारी पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश में है।
राष्ट्र प्रेस
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