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पंचायत चुनाव में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार को 10 जुलाई तक रोडमैप पेश करने का आदेश

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पंचायत चुनाव में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार को 10 जुलाई तक रोडमैप पेश करने का आदेश

सारांश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यूपी में पंचायत चुनाव टालने और ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने पर सरकार को आड़े हाथों लिया। अदालत ने दो-टूक कहा — संविधान के तहत पंचायतों का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जा सकता, और राज्य निर्वाचन आयोग को 10 जुलाई तक चुनाव का पूरा रोडमैप पेश करना होगा।

मुख्य बातें

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यूपी में पंचायत चुनाव में देरी पर राज्य सरकार को फटकार लगाई।
राज्य निर्वाचन आयोग को 10 जुलाई तक चुनाव का विस्तृत कार्यक्रम पेश करने का आदेश।
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को ही समाप्त हो चुका है; अदालत के अनुसार इसे संवैधानिक रूप से नहीं बढ़ाया जा सकता।
सरकार ने 19 मई को छह महीने के कार्यकाल वाला ओबीसी आयोग गठित किया है; उसे भी रिपोर्ट 10 जुलाई तक देनी होगी।
अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी के अनुसार मामला मंगलवार को पहली बार सूचीबद्ध हुआ था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में लंबित पंचायत चुनावों में हो रही देरी और ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए राज्य निर्वाचन आयोग को 10 जुलाई तक चुनाव का विस्तृत कार्यक्रम पेश करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल निश्चित है और उसे किसी भी हाल में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

अदालत का सख्त रुख

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को ही समाप्त हो चुका है, और बिना चुनाव कराए प्रशासनिक व्यवस्था को लंबे समय तक नहीं खींचा जा सकता। अदालत ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, और कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नई पंचायतों के गठन की ज़िम्मेदारी सरकार पर थी।

सरकार की दलील और अदालत का जवाब

राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि 19 मई को छह महीने के कार्यकाल वाले एक ओबीसी आयोग का गठन किया गया है, जो आरक्षण को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंपेगा, और उसी आधार पर चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। हालाँकि पीठ इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई और टिप्पणी की कि यदि ओबीसी आयोग का गठन आवश्यक था, तो यह काम पहले ही पूरा किया जाना चाहिए था, ताकि चुनाव प्रक्रिया प्रभावित न हो।

ओबीसी आयोग को भी निर्देश

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने बताया कि यह मामला मंगलवार को पहली बार अदालत में आया था, जब पीठ ने सरकारी वकील को आवश्यक निर्देश प्राप्त करने का समय दिया था। बुधवार को पुनः सूचीबद्ध सुनवाई में अदालत ने ओबीसी आयोग को भी निर्देश दिया कि वह अपनी रिपोर्ट 10 जुलाई तक अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।

क्यों मायने रखता है यह आदेश

यह आदेश ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में पंचायत स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह प्रशासनिक व्यवस्था चल रही है। पीठ ने टिप्पणी की कि पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है, और इसमें कोई संवैधानिक खालीपन स्वीकार्य नहीं है। गौरतलब है कि ओबीसी आरक्षण के सर्वेक्षण से जुड़े विवाद देश के कई राज्यों में पंचायत और निकाय चुनावों की देरी की मुख्य वजह बनते रहे हैं।

आगे क्या

राज्य निर्वाचन आयोग को अब 10 जुलाई तक चुनावों का स्पष्ट और विस्तृत कार्यक्रम अदालत के समक्ष रखना होगा। सरकार के अगले कदम और ओबीसी आयोग की रिपोर्ट यह तय करेंगे कि प्रदेश में पंचायत चुनाव कब और किस आरक्षण ढाँचे के तहत कराए जाएँगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें ओबीसी सर्वेक्षण और आरक्षण-समीक्षा को आधार बनाकर पंचायत और निकाय चुनावों को टाला जाता रहा है। महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक, अदालतें बार-बार याद दिला चुकी हैं कि स्थानीय निकायों का कार्यकाल पाँच वर्ष का संवैधानिक अधिकार है, सरकार की सुविधा का विषय नहीं। असली परीक्षा यह है कि क्या यूपी सरकार 10 जुलाई की समयसीमा का सम्मान करती है, या ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को आगे की देरी के औचित्य के रूप में पेश करती है। तब तक प्रशासकों के सहारे चल रही ग्राम पंचायतें ग्रामीण जवाबदेही के ढाँचे में एक चुप्पी बनी रहेंगी।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पंचायत चुनाव पर क्या आदेश दिया है?
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग को 10 जुलाई तक पंचायत चुनावों का विस्तृत कार्यक्रम पेश करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के तहत पंचायतों का कार्यकाल बढ़ाया नहीं जा सकता।
यूपी में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल कब समाप्त हुआ?
अदालत में पेश तथ्यों के अनुसार उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो चुका है। तब से ग्राम स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना प्रशासनिक व्यवस्था चल रही है।
पंचायत चुनाव में देरी की वजह क्या बताई गई है?
राज्य सरकार ने अदालत में बताया कि उसने 19 मई को छह महीने के कार्यकाल वाला एक ओबीसी आयोग गठित किया है, और उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही ओबीसी आरक्षण तय कर चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। हालाँकि अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई।
ओबीसी आयोग को अदालत ने क्या निर्देश दिया है?
पीठ ने ओबीसी आयोग को भी निर्देश दिया है कि वह अपनी रिपोर्ट 10 जुलाई तक अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। यह वही तिथि है जो राज्य निर्वाचन आयोग के लिए चुनाव कार्यक्रम पेश करने हेतु तय की गई है।
यह आदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
यह आदेश ग्रामीण लोकतंत्र की निरंतरता से जुड़ा है, क्योंकि पंचायतें स्थानीय शासन की सबसे बुनियादी इकाई हैं। अदालत की टिप्पणी कि ‘संवैधानिक प्रक्रिया में देरी स्वीकार्य नहीं’, राज्यों द्वारा निकाय चुनाव टालने के बढ़ते चलन पर एक स्पष्ट संदेश है।
राष्ट्र प्रेस
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