26 जून 2026
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी पंचायत चुनाव पर बड़ा फैसला: प्रधानों को प्रशासक रखने पर रोक, सरकार से माँगा चुनाव रोडमैप

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी पंचायत चुनाव पर बड़ा फैसला: प्रधानों को प्रशासक रखने पर रोक, सरकार से माँगा चुनाव रोडमैप

सारांश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमें 57,000 से अधिक ग्राम प्रधानों को कार्यकाल बीतने के बाद भी प्रशासक बनाए रखा गया था। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के का उल्लंघन बताया और 13 जुलाई तक चुनाव का स्पष्ट रोडमैप माँगा।

मुख्य बातें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने संबंधी 25-26 मई 2026 के सरकारी आदेशों पर रोक लगाई।
प्रदेश की 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है।
अदालत ने कहा कि यूपी पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) पहले ही असंवैधानिक घोषित हो चुकी है, इस पर आधारित आदेश अवैध हैं।
राज्य निर्वाचन आयोग ने बताया कि मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित हो चुकी है और वह चुनाव के लिए तैयार है।
राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को देरी का कारण बताया, जिस पर अदालत ने नाराज़गी जताई।
मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को; असंतोषजनक जवाब पर संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस निर्णय पर कड़ा रुख अपनाया है, जिसके तहत त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव स्थगित कर 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रधानों को कार्यकाल समाप्ति के बाद भी प्रशासक के रूप में बनाए रखा गया था। न्यायालय ने इन आदेशों के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाते हुए राज्य सरकार से चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा सहित विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को निर्धारित है।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 और 26 मई 2026 को जारी उन सरकारी आदेशों की वैधता पर सवाल उठाए, जिनके ज़रिये पंचायत चुनाव स्थगित कर ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये आदेश उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के आधार पर जारी किए गए, जबकि उच्च न्यायालय की खंडपीठ इस प्रावधान को पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी है।

गौरतलब है कि प्रदेश के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने चुनाव स्थगित करते हुए मौजूदा प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

संवैधानिक आधार

न्यायालय ने रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के पंचायतों के पाँच वर्षीय कार्यकाल और समयबद्ध चुनाव की स्पष्ट व्यवस्था करते हैं। अदालत के अनुसार किसी प्रशासनिक आदेश या विधायी प्रावधान के ज़रिये इस कार्यकाल को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। प्रधानों को प्रशासक बनाकर पद पर बनाए रखना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

सरकार और निर्वाचन आयोग का पक्ष

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को चुनाव में देरी का कारण बताया। इस पर अदालत ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आयोग अब तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सका है।

वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को सूचित किया कि मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। आयोग ने यह भी बताया कि राज्य सरकार की ओर से आवश्यक प्रशासनिक और लॉजिस्टिक सहयोग अब तक उपलब्ध नहीं कराया गया है।

अदालत की चेतावनी

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए हलफनामे में ओबीसी आयोग की प्रगति, चुनाव की प्रस्तावित समय-सीमा और देरी के कारणों का विस्तृत विवरण देने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो 25 मई का आदेश जारी करने वाले संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा। न्यायालय ने चेतावनी दी कि असंवैधानिक प्रावधानों के आधार पर आदेश जारी करने को प्रथम दृष्टया अवमानना के रूप में भी देखा जा सकता है।

आगे क्या होगा

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद प्रदेश की 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक संचालन को लेकर नई स्थिति उत्पन्न हो गई है। राज्य सरकार को अब 13 जुलाई 2026 की सुनवाई से पहले चुनाव का स्पष्ट रोडमैप अदालत के सामने रखना होगा। यह मामला उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था और ओबीसी आरक्षण की राजनीति दोनों के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि सर्वोच्च न्यायालय बार-बार 'ट्रिपल टेस्ट' की शर्त पर ज़ोर दे चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख संवैधानिक स्पष्टता की दृष्टि से सराहनीय है, लेकिन असली सवाल यह है कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में देरी किसके हित में है। 57,000 पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधित्व की अनुपस्थिति ज़मीनी लोकतंत्र को खोखला करती है और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को भी प्रभावित करती है। अदालत की अवमानना की चेतावनी एक संकेत है कि न्यायपालिका इस बार केवल निर्देश देकर नहीं रुकेगी।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पंचायत चुनाव मामले में क्या आदेश दिया?
हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने संबंधी 25-26 मई 2026 के सरकारी आदेशों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार से ओबीसी आयोग की प्रगति और चुनाव की समय-सीमा सहित विस्तृत हलफनामा माँगा गया है।
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव क्यों नहीं हो रहे हैं?
राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को चुनाव में देरी का कारण बताया है। हालाँकि हाईकोर्ट ने इस तर्क पर नाराज़गी जताई, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आयोग अब तक रिपोर्ट नहीं दे सका है।
यूपी पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) क्यों विवादास्पद है?
उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) को हाईकोर्ट की खंडपीठ पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने इसी प्रावधान के आधार पर प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने के आदेश जारी किए, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
राज्य निर्वाचन आयोग की इस मामले में क्या स्थिति है?
राज्य निर्वाचन आयोग ने हाईकोर्ट को बताया कि मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित हो चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए तैयार है। आयोग के अनुसार राज्य सरकार की ओर से आवश्यक प्रशासनिक और लॉजिस्टिक सहयोग नहीं मिल रहा है।
इस मामले में आगे क्या होगा और आम नागरिकों पर क्या असर पड़ेगा?
मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी, जिसमें सरकार को चुनाव का स्पष्ट रोडमैप देना होगा। हाईकोर्ट के आदेश के बाद 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक संचालन को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, जो ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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