भारतीय नागरिक बनकर अंतिम सांस लेना चाहती हैं 95 वर्षीया महालक्ष्मम्मा, अमेरिकी नागरिकता छोड़ी
सारांश
मुख्य बातें
आंध्र प्रदेश के बापटला जिले के चिंतागुम्पाला गांव की 94 वर्षीया के. महालक्ष्मम्मा ने अपनी जिंदगी की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए एक असाधारण कदम उठाया है — उन्होंने अपनी अमेरिकी नागरिकता त्यागकर भारतीय नागरिकता बहाल कराने की प्रक्रिया शुरू की है। 26 जून 2026 को बापटला के जिला कलेक्टर के समक्ष उन्होंने भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली और भावुक होकर तेलुगु में कहा, 'कलेक्टर गरु, मेरी उम्र अब 95 साल होने वाली है। मैं भारतीय नागरिक के रूप में मरना चाहती हूं।'
महालक्ष्मम्मा की जीवन यात्रा
महालक्ष्मम्मा ने अपने पति नागभूषणम के निधन के बाद अपने बेटे डॉ. कोंड्रुगुंटा के. पिच्चैया के पास अमेरिका जाने का निर्णय लिया था। उनके बेटे पेशे से ऑन्कोलॉजिस्ट हैं और वर्तमान में गुंटूर स्थित एनआरआई मेडिकल कॉलेज के निदेशक हैं। महालक्ष्मम्मा ने 27 जुलाई 2000 को अमेरिकी नागरिकता ग्रहण की थी और लगभग 20 वर्षों तक वहां रहने के बाद वर्ष 2018 में परिवार सहित अपने पैतृक गांव लौट आई थीं।
शपथ की प्रक्रिया और विशेष व्यवस्था
गंभीर श्रवण समस्या और अंग्रेजी न समझ पाने के कारण शपथ का तेलुगु में अनुवाद किया गया। उनके बेटे ने तेलुगु में शपथ पढ़कर सुनाई, जिसे महालक्ष्मम्मा ने बापटला जिला कलेक्टर वी. विनोद कुमार के सामने दोहराया। इस प्रकार नागरिकता अधिनियम के तहत आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई। इस भावुक क्षण का वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुआ।
आवेदन की स्थिति और आगे की प्रक्रिया
जिला कलेक्टर के अनुसार, महालक्ष्मम्मा ने 1 जून को भारतीय नागरिकता बहाल करने के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था और राज्य सचिवालय से भी अपील की थी। शपथ ग्रहण के बाद कलेक्टर ने आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर फाइल आंध्र प्रदेश राज्य सचिवालय भेज दी है। वहां से यह फाइल केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी, जो भारतीय नागरिकता बहाल करने पर अंतिम निर्णय लेगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के राज्यसभा सांसद सना सतीश बाबू ने इस घटना को 'बेहद भावुक और प्रेरणादायक' बताया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि किसी भी पासपोर्ट या डॉलर से अपनी मातृभूमि और जड़ों का रिश्ता बड़ा नहीं हो सकता। आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने कहा कि महालक्ष्मम्मा का फैसला हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है और यह मातृभूमि के प्रति प्रेम का सशक्त संदेश देता है।
अंतिम इच्छा — मिट्टी में मिलना अपनी मिट्टी से
अधिकारियों के अनुसार, महालक्ष्मम्मा की इच्छा है कि जीवन के अंतिम दिन उनके गांव में बीतें और अंतिम संस्कार भी वहीं किया जाए। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब प्रवासी भारतीयों की मातृभूमि से भावनात्मक जुड़ाव की बहस एक बार फिर चर्चा में है। गृह मंत्रालय की मंजूरी के बाद ही उनकी अंतिम इच्छा औपचारिक रूप से पूरी हो सकेगी।