अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 2026 का भव्य आगाज़, 347 देवी-देवताओं के साथ रघुनाथ रथ यात्रा शुरू
सारांश
मुख्य बातें
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव 21 अक्टूबर 2026 को विधिवत रूप से शुरू हो गया, जिसमें कुल्लू के सुल्तानपुर स्थित भगवान रघुनाथ मंदिर में सुबह से ही देवी-देवताओं की पालकियों का आगमन जारी रहा और हज़ारों श्रद्धालुओं ने दर्शन लाभ लिया। माता हिडिंबा के कुल्लू पहुँचते ही ऐतिहासिक रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ और घाटी का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा।
347 देवी-देवताओं का जमावड़ा
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेन्द्र सिंह ने बताया कि इस वर्ष उत्सव में 347 देवी-देवताओं की झांकियों को आमंत्रित किया गया है। सुबह से ही विभिन्न क्षेत्रों से पालकियाँ सुल्तानपुर मंदिर पहुँचती रहीं। यह संख्या इस उत्सव की व्यापकता और कुल्लू घाटी की देव परंपरा की जीवंतता का प्रमाण है।
माता हिडिंबा का भव्य आगमन और रथ यात्रा
कुल्लू राज परिवार की कुलदेवी और दादी माता हिडिंबा भी उत्सव में शामिल होने के लिए कुल्लू पहुँच गईं, जिनका विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने भव्य स्वागत किया। सुल्तानपुर पहुँचने के बाद माता हिडिंबा ने राज परिवार से भेंट की, इसके बाद शस्त्र पूजन संपन्न हुआ। तत्पश्चात माता ढालपुर मैदान के लिए रवाना हुईं, जहाँ से दोपहर बाद ऐतिहासिक रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ।
अठ चाकरी — सदियों पुरानी देव परंपरा
दानवेन्द्र सिंह के अनुसार, कई श्रद्धालु 100 से 200 किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करके भगवान रघुनाथ के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। स्थानीय भाषा में इस परंपरा को 'अठ चाकरी' (आठ चाकरी) कहा जाता है, जो कुल्लू घाटी की सदियों पुरानी और अत्यंत महत्वपूर्ण देव परंपरा है। यह परंपरा इस उत्सव को केवल एक मेले से आगे, आस्था की एक असाधारण अभिव्यक्ति बनाती है।
ढालपुर मैदान में सात दिवसीय आयोजन
भगवान रघुनाथ पूरे लाव-लश्कर के साथ ढालपुर मैदान पहुँचे, जहाँ 27 अक्टूबर 2026 तक सात दिनों के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। प्रतिदिन विधिवत पूजा-अर्चना होगी और भगवान रघुनाथ खुले दरबार में श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे। नाग देवता, नारायण और अन्य देवी-देवताओं की उपस्थिति से पूरा क्षेत्र भक्ति के रंग में डूबा रहेगा।
घाटी में भक्ति और उल्लास का माहौल
शंखध्वनि, खड़ताल, नरसिंगों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से पूरी कुल्लू घाटी का वातावरण भक्तिमय बन गया है। हज़ारों श्रद्धालु और पर्यटक देव संस्कृति के इस अनूठे संगम के साक्षी बन रहे हैं। गौरतलब है कि यह उत्सव अपने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप के कारण देश-विदेश के आगंतुकों को भी आकर्षित करता है, जिससे हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच मिलता है।