21 अक्टूबर 2026
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 2026 का भव्य आगाज़, 347 देवी-देवताओं के साथ रघुनाथ रथ यात्रा शुरू

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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 2026 का भव्य आगाज़, 347 देवी-देवताओं के साथ रघुनाथ रथ यात्रा शुरू

सारांश

347 देवी-देवताओं की पालकियाँ, माता हिडिंबा का भव्य आगमन और सदियों पुरानी 'अठ चाकरी' परंपरा — अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 2026 का आगाज़ महज़ एक उत्सव नहीं, बल्कि कुल्लू घाटी की जीवंत देव संस्कृति का विश्व-मंच पर प्रदर्शन है।

मुख्य बातें

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव 21 अक्टूबर 2026 को सुल्तानपुर, कुल्लू में विधिवत शुरू हुआ।
इस वर्ष 347 देवी-देवताओं की झांकियों को उत्सव में आमंत्रित किया गया है।
कुल्लू राज परिवार की कुलदेवी माता हिडिंबा कुल्लू पहुँचीं; शस्त्र पूजन के बाद ऐतिहासिक रथ यात्रा आरंभ।
कई श्रद्धालु 100-200 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर दर्शन को आते हैं — इसे 'अठ चाकरी' परंपरा कहा जाता है।
उत्सव 27 अक्टूबर 2026 तक ढालपुर मैदान में सात दिनों के धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ जारी रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव 21 अक्टूबर 2026 को विधिवत रूप से शुरू हो गया, जिसमें कुल्लू के सुल्तानपुर स्थित भगवान रघुनाथ मंदिर में सुबह से ही देवी-देवताओं की पालकियों का आगमन जारी रहा और हज़ारों श्रद्धालुओं ने दर्शन लाभ लिया। माता हिडिंबा के कुल्लू पहुँचते ही ऐतिहासिक रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ और घाटी का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा।

347 देवी-देवताओं का जमावड़ा

भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेन्द्र सिंह ने बताया कि इस वर्ष उत्सव में 347 देवी-देवताओं की झांकियों को आमंत्रित किया गया है। सुबह से ही विभिन्न क्षेत्रों से पालकियाँ सुल्तानपुर मंदिर पहुँचती रहीं। यह संख्या इस उत्सव की व्यापकता और कुल्लू घाटी की देव परंपरा की जीवंतता का प्रमाण है।

माता हिडिंबा का भव्य आगमन और रथ यात्रा

कुल्लू राज परिवार की कुलदेवी और दादी माता हिडिंबा भी उत्सव में शामिल होने के लिए कुल्लू पहुँच गईं, जिनका विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने भव्य स्वागत किया। सुल्तानपुर पहुँचने के बाद माता हिडिंबा ने राज परिवार से भेंट की, इसके बाद शस्त्र पूजन संपन्न हुआ। तत्पश्चात माता ढालपुर मैदान के लिए रवाना हुईं, जहाँ से दोपहर बाद ऐतिहासिक रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ।

अठ चाकरी — सदियों पुरानी देव परंपरा

दानवेन्द्र सिंह के अनुसार, कई श्रद्धालु 100 से 200 किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करके भगवान रघुनाथ के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। स्थानीय भाषा में इस परंपरा को 'अठ चाकरी' (आठ चाकरी) कहा जाता है, जो कुल्लू घाटी की सदियों पुरानी और अत्यंत महत्वपूर्ण देव परंपरा है। यह परंपरा इस उत्सव को केवल एक मेले से आगे, आस्था की एक असाधारण अभिव्यक्ति बनाती है।

ढालपुर मैदान में सात दिवसीय आयोजन

भगवान रघुनाथ पूरे लाव-लश्कर के साथ ढालपुर मैदान पहुँचे, जहाँ 27 अक्टूबर 2026 तक सात दिनों के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। प्रतिदिन विधिवत पूजा-अर्चना होगी और भगवान रघुनाथ खुले दरबार में श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे। नाग देवता, नारायण और अन्य देवी-देवताओं की उपस्थिति से पूरा क्षेत्र भक्ति के रंग में डूबा रहेगा।

घाटी में भक्ति और उल्लास का माहौल

शंखध्वनि, खड़ताल, नरसिंगों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से पूरी कुल्लू घाटी का वातावरण भक्तिमय बन गया है। हज़ारों श्रद्धालु और पर्यटक देव संस्कृति के इस अनूठे संगम के साक्षी बन रहे हैं। गौरतलब है कि यह उत्सव अपने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप के कारण देश-विदेश के आगंतुकों को भी आकर्षित करता है, जिससे हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच मिलता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी इसकी असली ताकत उन श्रद्धालुओं में है जो 200 किलोमीटर पैदल चलकर 'अठ चाकरी' निभाते हैं — यह वह आस्था है जो किसी सरकारी प्रमाण-पत्र की मोहताज नहीं। 347 देवी-देवताओं की उपस्थिति यह भी बताती है कि हिमाचल की देव परंपरा कितनी विकेन्द्रित और जन-जड़ों से जुड़ी है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर रथ यात्रा की भव्यता तक सिमट जाती है, लेकिन असली कहानी उन हज़ारों अनाम श्रद्धालुओं की है जो इस उत्सव को जीवित रखते हैं।
RashtraPress
21 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 2026 कब शुरू हुआ और कब तक चलेगा?
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव 21 अक्टूबर 2026 को शुरू हुआ और 27 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। इस सात दिवसीय उत्सव का मुख्य स्थल कुल्लू का ढालपुर मैदान है।
कुल्लू दशहरा में इस वर्ष कितने देवी-देवता शामिल हो रहे हैं?
इस वर्ष कुल 347 देवी-देवताओं की झांकियों को उत्सव में आमंत्रित किया गया है। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेन्द्र सिंह ने यह जानकारी दी।
'अठ चाकरी' परंपरा क्या है?
'अठ चाकरी' कुल्लू घाटी की सदियों पुरानी देव परंपरा है जिसमें श्रद्धालु 100 से 200 किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करके भगवान रघुनाथ के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। यह कुल्लू दशहरा की सबसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक मानी जाती है।
माता हिडिंबा का कुल्लू दशहरा से क्या संबंध है?
माता हिडिंबा कुल्लू राज परिवार की कुलदेवी और दादी माता हैं। वे हर वर्ष दशहरे में शामिल होने के लिए कुल्लू पहुँचती हैं और उनके आगमन के बाद ही पारंपरिक शस्त्र पूजन और ढालपुर मैदान से रथ यात्रा का शुभारंभ होता है।
कुल्लू दशहरा को अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा क्यों मिला है?
कुल्लू दशहरा अपनी अनूठी देव परंपरा, सैकड़ों देवी-देवताओं की एक साथ उपस्थिति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। यह उत्सव देश-विदेश के पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जिससे हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान वैश्विक स्तर पर स्थापित होती है।
राष्ट्र प्रेस
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