अरुणाचल में कॉफी क्रांति: CM पेमा खांडू ने 600 हेक्टेयर से आगे बढ़ाने का संकल्प लिया
सारांश
मुख्य बातें
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने 4 अक्टूबर 2025 को ईटानगर में आयोजित 'हिल्स टू कप' कॉफी वर्कशॉप के उद्घाटन अवसर पर राज्य में कॉफी की खेती का व्यापक विस्तार करने, बीन की गुणवत्ता सुधारने और वैल्यू चेन को सुदृढ़ करके किसानों की आमदनी बढ़ाने का आह्वान किया। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल राज्य में केवल 600 हेक्टेयर भूमि पर कॉफी की खेती होती है — एक ऐसा आँकड़ा जिसे मुख्यमंत्री ने राज्य की वास्तविक क्षमता के अनुरूप बेहद कम बताया।
वर्कशॉप की पृष्ठभूमि और उद्देश्य
यह वर्कशॉप कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया और राज्य के कृषि विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। इसमें किसान, युवा उद्यमी, तकनीकी विशेषज्ञ और क्षेत्र से जुड़े अन्य हितधारक एक मंच पर एकत्रित हुए। खांडू ने इसे अरुणाचल प्रदेश में कॉफी की खेती के इतिहास का 'पहला अध्याय' करार दिया।
गौरतलब है कि राज्य में कॉफी की खेती लगभग पाँच दशक पहले शुरू हो गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि इतने वर्षों में इस क्षेत्र की संभावनाओं के बारे में न तो पर्याप्त जागरूकता फैली और न ही इसे समुचित प्रोत्साहन मिला। यह स्वीकारोक्ति स्वयं सरकारी नीति की एक महत्त्वपूर्ण खामी की ओर इशारा करती है।
नीतिगत कदम और अध्ययन दल का गठन
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि उन्होंने कृषि अधिकारियों, एक सेवानिवृत्त पीसीसीएफ और अरुणाचल प्रदेश फॉरेस्ट कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष से मिलकर बने तीन सदस्यीय दल का गठन किया है। यह दल आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों का दौरा कर कॉफी की खेती के तरीकों और विकास मॉडलों का अध्ययन करेगा।
खांडू ने यह भी बताया कि वे स्वयं कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया से संवाद करेंगे ताकि इस क्षेत्र को समर्थन देने के लिए उपयुक्त नीतिगत उपाय तय किए जा सकें। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने पिछले पाँच-छह वर्षों में कृषि और बागवानी के लिए अनेक योजनाएँ शुरू की हैं, किंतु कॉफी के लिए अब तक कोई समर्पित नीति नहीं बनाई गई है।
भूगोल और कृषि क्षमता
मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि राज्य की विविध जलवायु परिस्थितियाँ, उपजाऊ मिट्टी और विभिन्न ऊँचाइयों वाले क्षेत्र कॉफी की खेती के विस्तार के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा बागानों का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी अरुणाचल में अरुणाचल प्रदेश फॉरेस्ट कॉर्पोरेशन के अंतर्गत आता है, जबकि कई किसानों ने इसे पायलट या मॉडल परियोजना के रूप में अपनाया है।
यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य वैकल्पिक नकदी फसलों की तलाश में हैं और कॉफी की वैश्विक माँग लगातार बढ़ रही है।
युवा उद्यमियों और पर्यटन से जुड़ाव
खांडू ने कॉफी को युवाओं के लिए रोज़गार और उद्यमिता का एक सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि राज्य का तेज़ी से बढ़ता पर्यटन क्षेत्र कॉफी उत्पादकों और कारोबारियों के लिए नए अवसर खोल सकता है। उनके अनुसार, अरुणाचल आने वाले पर्यटक कॉफी में गहरी रुचि रखते हैं, जो स्थानीय उत्पाद की माँग को और बढ़ा सकता है।
मुख्यमंत्री ने वर्कशॉप में भाग लेने वालों को आश्वस्त किया कि तकनीकी विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर राज्य सरकार आने वाले दिनों में पूरा सहयोग प्रदान करेगी। वर्कशॉप का उद्देश्य किसानों की तकनीकी कमियों और चुनौतियों की पहचान करना भी है, जिसके आधार पर कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ सरकार को ठोस सिफारिशें सौंपेंगे।
यदि नीति निर्माण और क्षेत्र-अध्ययन की यह प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ती है, तो अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर भारत में कॉफी उत्पादन के एक उभरते केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना सकता है।