असम में लखीमी नस्ल की दुनिया की पहली आईवीएफ बछिया का जन्म, सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया ऐतिहासिक
सारांश
मुख्य बातें
असम के गुवाहाटी स्थित असम पशु चिकित्सा एवं मत्स्य विश्वविद्यालय में 22 अगस्त 2026 को एक वैश्विक वैज्ञानिक उपलब्धि दर्ज की गई — राज्य की स्वदेशी लखीमी नस्ल की दुनिया की पहली आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन) मादा बछिया का सफलतापूर्वक जन्म हुआ। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए इसे असम के पशुधन और डेयरी क्षेत्र के लिए नए युग की शुरुआत बताया।
कहाँ और कैसे हुई यह सफलता
यह ऐतिहासिक उपलब्धि खानापारा, गुवाहाटी स्थित पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय की आईवीएफ प्रयोगशाला में हासिल की गई, जिसे राष्ट्रीय गोकुल मिशन के सहयोग से स्थापित किया गया है। वैज्ञानिकों ने उन्नत असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) का उपयोग करते हुए लखीमी नस्ल के आनुवंशिक संसाधनों को संरक्षित करते हुए भ्रूण विकसित किया और उसे सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया।
गौरतलब है कि इसी वर्ष की शुरुआत में इन्हीं वैज्ञानिकों ने सोनापुर में गिर नस्ल की असम की पहली आईवीएफ बछिया पैदा कर फील्ड परिस्थितियों में भ्रूण-स्थानांतरण तकनीक की व्यवहार्यता सिद्ध की थी। लखीमी नस्ल की बछिया का जन्म उस श्रृंखला की अगली और अधिक महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि यह पहली बार किसी स्वदेशी असमिया नस्ल पर इस तकनीक का सफल प्रयोग है।
मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर इस विकास को असम की 'सभ्यता, संस्कृति और सृजन' का ऐतिहासिक संगम बताया। उन्होंने कहा, 'असम की मूल लखीमी नस्ल की दुनिया की पहली आईवीएफ मादा बछिया का जन्म असम पशु चिकित्सा और मत्स्य विश्वविद्यालय में हुआ है।'
सरमा ने नवजात बछिया को आकार में छोटा लेकिन असम के जैव प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम के लिए वैज्ञानिक उपलब्धि के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने इस कार्य में योगदान देने वाले सभी पशु चिकित्सा वैज्ञानिकों और पेशेवरों को हार्दिक बधाई दी और 'गौ माता' का आह्वान करते हुए अपना संदेश समाप्त किया।
लखीमी नस्ल के संरक्षण में क्यों अहम है यह कदम
लखीमी असम की मूल स्वदेशी मवेशी नस्ल है, जो स्थानीय जलवायु और परिस्थितियों के अनुकूल होने के कारण विशेष महत्व रखती है। आधुनिकीकरण और संकर नस्लों के प्रसार के कारण इस नस्ल की संख्या पर दबाव बढ़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, आईवीएफ तकनीक के ज़रिए इस नस्ल के बेहतर आनुवंशिक स्टॉक का तेज़ गुणन संभव है, जिससे नस्ल का संरक्षण और साथ-साथ दूध उत्पादकता में सुधार दोनों एक साथ हासिल किए जा सकते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत देशभर में स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और उन्नयन पर ज़ोर दे रही है। असम की यह सफलता उस राष्ट्रीय प्रयास को ज़मीनी स्तर पर साकार करने का उदाहरण है।
आम जनता और किसानों पर असर
वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस तकनीक के व्यापक उपयोग से दूध उत्पादकता में सुधार, बेहतर रोग नियंत्रण और स्वदेशी नस्ल संरक्षण — तीनों लक्ष्य एक साथ साधे जा सकते हैं। दीर्घकालिक दृष्टि से, इन प्रयासों से असम की डेयरी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होने और पशुपालक किसानों की आय में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
आगे की राह
असम पशु चिकित्सा एवं मत्स्य विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अब इस तकनीक को व्यापक पैमाने पर लागू करने की दिशा में काम करेंगे। यह सफलता राज्य के पशुधन विकास में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी को मुख्यधारा में लाने के चल रहे प्रयासों की अगली कड़ी है, और भविष्य में अन्य दुर्लभ स्वदेशी नस्लों के लिए भी इस मॉडल को अपनाया जा सकता है।