1 सितंबर 2026
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महाकालेश्वर मंदिर में त्रिनेत्र और सूर्य-चंद्र शृंगार के साथ भव्य भस्म आरती, उमड़े हजारों श्रद्धालु

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महाकालेश्वर मंदिर में त्रिनेत्र और सूर्य-चंद्र शृंगार के साथ भव्य भस्म आरती, उमड़े हजारों श्रद्धालु

सारांश

भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल को त्रिनेत्र और सूर्य-चंद्र से सजाकर भव्य भस्म आरती की गई। महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा के तहत संपन्न इस आरती में हजारों श्रद्धालु साक्षी बने।

मुख्य बातें

1 सितंबर 2026 , भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल को त्रिनेत्र लगाकर तथा सूर्य और चंद्रमा के प्रतीकों से दिव्य स्वरूप में सजाया गया।
दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक के बाद महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म आरती अर्पित की गई।
भस्म आरती में पुरुषों के लिए धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।
हजारों श्रद्धालु बीती रात से ही कतारबद्ध होकर इस अलौकिक दर्शन के साक्षी बने।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 1 सितंबर 2026, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बाबा महाकाल की भस्म आरती अत्यंत दिव्य और भव्य रूप में संपन्न हुई। बाबा को त्रिनेत्र लगाकर सजाया गया और सूर्य एवं चंद्रमा के प्रतीकों से उनका दिव्य स्वरूप निखारा गया। इस अलौकिक दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु बीती रात से ही मंदिर परिसर में कतारबद्ध हो गए थे।

कपाट खुलने का दिव्य क्षण

मंगलवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात् ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। जैसे ही श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हुए, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। घंटियों की टंकार, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

पूजा और अभिषेक की विधि

कपाट खुलने के साथ ही मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। पूजा के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के बाद बाबा ने मुकुट धारण किया, तत्पश्चात् झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की मधुर ध्वनि के बीच भस्म आरती की गई।

भव्य शृंगार — त्रिनेत्र से सूर्य-चंद्र तक

इस विशेष तिथि पर बाबा महाकाल को त्रिनेत्र लगाकर शृंगार किया गया। सूर्य और चंद्रमा के प्रतीकों से सुसज्जित उनका दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई।

परंपरा और मान्यता

परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के बाद बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों को पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य होता है।

श्रद्धालुओं का सैलाब

इस पावन दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त उज्जैन की पावन नगरी में पहुँचे। अनेक श्रद्धालु बीती रात से ही कतारबद्ध थे, ताकि भस्म आरती के इस अलौकिक क्षण के साक्षी बन सकें। आने वाले दिनों में भाद्रपद माह की अन्य विशेष तिथियों पर भी इसी प्रकार के दिव्य शृंगार और आरती के आयोजन की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है। भाद्रपद के विशेष तिथियों पर होने वाले शृंगार — विशेषकर त्रिनेत्र और सूर्य-चंद्र जैसे प्रतीकों का समावेश — यह दर्शाते हैं कि यह परंपरा सदियों पुरानी शैव आगम पद्धति से जीवंत रूप में जुड़ी हुई है। महानिर्वाणी अखाड़े की केंद्रीय भूमिका इस अनुष्ठान की संस्थागत निरंतरता को रेखांकित करती है। यह भी उल्लेखनीय है कि महाकाल लोक के विकास के बाद से श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो धार्मिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाली एक विशेष धार्मिक आरती है, जिसमें बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि इस आरती के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
1 सितंबर 2026 को महाकाल का शृंगार किस प्रकार किया गया?
इस दिन बाबा महाकाल को त्रिनेत्र लगाकर सजाया गया और सूर्य एवं चंद्रमा के प्रतीकों से उनका दिव्य स्वरूप निखारा गया। पंचामृत अभिषेक, कपूर आरती और मुकुट धारण के बाद भस्म आरती संपन्न हुई।
भस्म आरती में शामिल होने के लिए क्या नियम हैं?
भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों को पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, आरती में प्रवेश के लिए पूर्व पंजीकरण की आवश्यकता होती है।
महानिर्वाणी अखाड़े की भस्म आरती में क्या भूमिका है?
परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे शैव परंपरा की संस्थागत निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।
भाद्रपद माह में महाकाल दर्शन का क्या महत्त्व है?
भाद्रपद माह को शिव आराधना के लिए विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। इस माह की कृष्ण पक्ष की तिथियों पर विशेष शृंगार और आरती के आयोजन होते हैं, जिनके लिए देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुँचते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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