भागलपुर की बीबी शबनम: रेशमी धागों से बुनी आत्मनिर्भरता, सालाना ₹10 लाख से अधिक की कमाई
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के भागलपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड स्थित मोहिबअली चक गांव की बीबी शबनम ने साबित कर दिया है कि पारंपरिक हुनर, सही संगठन और बाज़ार तक पहुँच मिले तो ग्रामीण महिला भी सफल उद्यमी बन सकती है। कभी महाजनों से उधार धागा लेकर मात्र 50 से 60 रुपये प्रति मीटर की मज़दूरी पर सिल्क साड़ी बुनने वाली शबनम आज 'बुनकर दीदी' की पहचान के साथ सालाना ₹10 लाख से अधिक की आय अर्जित कर रही हैं।
महाजनी चंगुल से मुक्ति की कहानी
समा जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य शबनम का परिवार पीढ़ियों से हथकरघा सिल्क बुनाई से जुड़ा रहा है। जीविका से जुड़ने से पहले गांव के करीब 15 बुनकर परिवार महाजनों पर पूरी तरह निर्भर थे — धागे के लिए भी और बाज़ार के लिए भी। इस व्यवस्था में परिवार की मासिक आय बमुश्किल ₹6,000 से ₹7,000 तक पहुँचती थी और काम भी अनियमित रहता था।
जीविका कार्यक्रम से जुड़ने के बाद शबनम ने गांव के सभी 15 बुनकर परिवारों को एकजुट कर प्राची जीविका महिला रेशम वस्त्र उत्पादक समूह का गठन किया। नई उड़ान जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ के माध्यम से इस उत्पादक समूह को कारोबार विस्तार के लिए ₹4 लाख 95 हज़ार की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई।
उत्पादन से बाज़ार तक — खुद की राह
अब शबनम स्वयं बाज़ार से धागा खरीदती हैं। एक सिल्क साड़ी तैयार करने में करीब 500 ग्राम धागा लगता है, जिसकी कीमत लगभग ₹3,200 होती है। बुनाई पर करीब ₹650 और फिनिशिंग पर कम से कम ₹100 का अतिरिक्त खर्च आता है — यानी एक साड़ी की कुल लागत करीब ₹4,000। इसे ₹4,500 से ₹5,000 तक में बेचने पर प्रति साड़ी ₹500 से ₹1,000 तक का शुद्ध लाभ होता है।
शबनम की विशेषता केवल खुद उत्पादन करना नहीं, बल्कि गांव की सभी बुनकर महिलाओं द्वारा तैयार साड़ियाँ खरीदकर उन्हें विभिन्न शहरों के मेलों और आयोजनों में स्टॉल के ज़रिये बेचना भी है। इस तरह वह अपने गांव की पूरी बुनकर अर्थव्यवस्था की धुरी बन गई हैं।
मेलों में करोड़ों की बिक्री
जीविका की मदद से शबनम को राज्य और देश के कई बड़े मंचों पर अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिला। रांची के खादी महोत्सव, पटना के बिहार सरस मेले, फरीदाबाद के सूरजकुंड मेले, नई दिल्ली के आईआईटीएफ, पटना के महिला उद्यमी मेले, कोलकाता सरस मेले और सिलीगुड़ी सरस मेले समेत विभिन्न आयोजनों में शबनम ने कुल ₹32.60 लाख की बिक्री की और करीब ₹4.81 लाख का लाभ अर्जित किया। कई बार एक ही आयोजन में वह 100 से अधिक साड़ियाँ बेच देती हैं।
विस्तार और नए ऑर्डर
सिल्क साड़ियों के अलावा शबनम दुपट्टे और अन्य रेशमी वस्त्र भी तैयार करती हैं। शिल्पग्राम महिला प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, दरभंगा की ओर से उन्हें 50 साड़ियों का ऑर्डर भी प्राप्त हुआ है। भागलपुर के थोक कारोबारियों के साथ-साथ देश के अन्य बाज़ारों में भी उनकी साड़ियों की माँग लगातार बढ़ रही है।
यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण महिला उद्यमिता को लेकर नीतिगत चर्चाएँ तेज़ हो रही हैं। शबनम की कहानी बताती है कि परंपरागत हुनर को संगठन, पूँजी और बाज़ार तक सीधी पहुँच मिले, तो महाजनी व्यवस्था की जगह आत्मनिर्भर उद्यमिता ले सकती है।