इंदौर भागीरथपुरा जल त्रासदी: कांग्रेस ने गायब इंजीनियरिंग रिकॉर्ड और 66 दिन की फाइल देरी पर सरकार से माँगा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश कांग्रेस ने 2 अक्टूबर 2026 को इंदौर के भागीरथपुरा में हुई दूषित पेयजल त्रासदी की न्यायिक जाँच रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं — जिनमें महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग दस्तावेजों का आयोग के समक्ष उपलब्ध न होना और प्रशासनिक स्तर पर एक अहम फाइल के 66 दिनों तक लंबित रहने का मुद्दा प्रमुख है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इंदौर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार से स्पष्ट जवाबदेही तय करने की माँग की।
न्यायिक आयोग की जाँच और रिपोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में गठित एक सदस्यीय आयोग ने भागीरथपुरा में पानी के दूषित होने, नागरिकों के बीमार पड़ने और मौतों के कारणों की विस्तृत जाँच की थी। आयोग ने जलापूर्ति एवं सीवरेज व्यवस्था की योजना, रखरखाव और निगरानी में हुई तकनीकी व प्रशासनिक खामियों की भी पड़ताल की। आयोग ने अपनी रिपोर्ट अगस्त 2026 में हाईकोर्ट को सौंपी।
कांग्रेस के अनुसार, रिपोर्ट में पाया गया कि भागीरथपुरा में सीवरेज का पानी पेयजल पाइपलाइनों में प्रवेश कर गया था, जिससे आपूर्ति किया जा रहा पानी दूषित और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो गया। जाँच में ई. कोली और टोटल कोलीफॉर्म सहित अन्य बैक्टीरिया के नमूनों में मिलने की पुष्टि की गई थी।
गायब दस्तावेज और प्रशासनिक चूक
सिंघार ने कहा, "महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग रिकॉर्ड आयोग के सामने उपलब्ध नहीं कराए गए। सरकार को बताना चाहिए कि ये रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं थे और इस चूक के लिए किसकी जवाबदेही तय होगी।" उन्होंने स्पष्ट किया कि लेआउट प्लान, ब्लूप्रिंट, डिज़ाइन ड्रॉइंग और पाइपलाइन अलाइनमेंट मैप जैसे तकनीकी दस्तावेज किसी भी शहरी जल नेटवर्क के प्रबंधन और रखरखाव के लिए बुनियादी आवश्यकता हैं।
कांग्रेस ने सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी एक फाइल के 66 दिनों तक मेयर के हस्ताक्षर के लिए लंबित रहने का भी मुद्दा उठाया। सिंघार ने सवाल किया कि इतनी लंबी प्रशासनिक देरी किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदारी कौन लेगा। गौरतलब है कि जाँच में यह भी कहा गया कि क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को समय पर बदल दिया जाता तो इस त्रासदी को टाला जा सकता था।
हालाँकि, मीडिया रिपोर्टों में उद्धृत जाँच के निष्कर्षों के अनुसार, केवल फाइल के लंबित रहने के आधार पर आयोग ने व्यक्तिगत रूप से मेयर की जिम्मेदारी तय नहीं की है — कांग्रेस का सवाल समग्र प्रशासनिक देरी और उससे जुड़ी जवाबदेही से संबंधित है।
मौतों का आँकड़ा और त्रासदी की पृष्ठभूमि
यह त्रासदी दिसंबर 2025 में सामने आई थी, जब भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने के बाद बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी गैस्ट्रोएंटेराइटिस, उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन जैसी जलजनित बीमारियों से पीड़ित हुए। जाँच आयोग ने कुल 36 मौतों की पड़ताल की, जिनमें से 22 मौतों को सिंघार द्वारा उद्धृत रिपोर्ट विवरण के अनुसार दूषित पानी से संबंधित माना गया। इस घटना से जुड़ी मौतों की सटीक संख्या को लेकर अलग अलग दावे सामने आते रहे हैं।
यह ऐसे समय में विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि इंदौर को लगातार कई वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा मिलता रहा है। सिंघार ने इसी विरोधाभास को रेखांकित करते हुए पूछा, "देश के सबसे स्वच्छ शहर में दूषित पेयजल के कारण मौतें कैसे हुईं?"
मुआवजे और सिफारिशों की माँग
जाँच आयोग ने प्रभावित परिवारों के लिए राहत की सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार, मृतकों के परिवारों को ₹10 लाख प्रति परिवार मुआवजा और प्रभावित मरीजों को आर्थिक एवं चिकित्सकीय सहायता दिए जाने की अनुशंसा की गई है। सिंघार ने सरकार से माँग की कि आयोग की इन सिफारिशों को तत्काल लागू किया जाए और प्रभावित परिवारों को मुआवजे का भुगतान शीघ्र किया जाए।
उन्होंने कहा, "भागीरथपुरा के लोगों को पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय मिलना चाहिए।" राज्य सरकार की ओर से इन सवालों पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस मामले में आगे की कार्रवाई और मुआवजे के क्रियान्वयन पर हाईकोर्ट की निगरानी जारी रहने की संभावना है।