यूसीसी पर सपा का BJP को घेरा: 'हिंदू-मुस्लिम के अलावा कुछ नहीं' — एसटी हसन
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी (सपा) के नेताओं ने 16 सितंबर 2026 को लखनऊ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला बोला, यह आरोप लगाते हुए कि सत्तारूढ़ दल के पास महंगाई, रोज़गार और किसानों जैसे ज़मीनी मुद्दों का कोई जवाब नहीं है। सपा नेताओं का कहना है कि यूसीसी को धार्मिक ध्रुवीकरण के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
एसटी हसन का सीधा हमला
सपा नेता एसटी हसन ने कहा, 'इस पार्टी (भाजपा) के पास हिंदू-मुस्लिम करने के अलावा और कुछ नहीं है। वे महंगाई, रोज़गार या किसानों के बारे में बात नहीं कर सकते।' उन्होंने आरोप लगाया कि जब सरकार कुछ नहीं कर पाती, तो रात के अंधेरे में मस्जिदों पर बुलडोज़र चलाया जाता है और 'वंदे मातरम' जैसे मुद्दे उठाए जाते हैं।
हसन ने यह भी कहा कि भारत में मुसलमानों की आबादी दूसरी सबसे बड़ी है और सिर्फ मुसलमान ही नहीं — इस्लाम, सिख और ईसाई धर्म को मानने वाले सभी लोगों के अपने धार्मिक नियम होते हैं। उनके अनुसार, यूसीसी लाकर सामाजिक माहौल को जानबूझकर बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है।
सपा सांसद का 'ध्यान भटकाने' का आरोप
सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने गृह मंत्री अमित शाह के यूसीसी संबंधी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार पहले भी महिला आरक्षण और 'वन नेशन-वन इलेक्शन' जैसे वादे कर चुकी है, जो आज 'ठंडे बस्ते' में पड़े हैं। उन्होंने कहा, 'जनता का इनके प्रति अविश्वास है, इसलिए ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के बयान दिए जाते हैं।'
कांग्रेस ने जताई सहमति, उठाए संवैधानिक सवाल
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने सपा नेता अखिलेश यादव के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि यूसीसी को राष्ट्रीय स्तर पर संसद में व्यापक चर्चा के बाद ही लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने राज्यवार यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ BJP 'एक विधान और एक निशान' की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग यूसीसी लाई जा रही है, जो अंतर्विरोधी है।
राजपूत ने इसे 'भाजपा के टुकड़े-टुकड़े गैंग की साजिश' करार देते हुए कहा कि इसे बेनकाब किया जाएगा।
यूसीसी विवाद का राजनीतिक संदर्भ
गौरतलब है कि यूसीसी का मुद्दा हाल के महीनों में राष्ट्रीय राजनीति में तेज़ी से उभरा है, खासकर उत्तराखंड जैसे BJP-शासित राज्यों द्वारा इसे लागू करने की कोशिशों के बाद। विपक्षी दल लंबे समय से यह तर्क देते आए हैं कि इस मुद्दे को चुनावी चक्र से पहले जानबूझकर उठाया जाता है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तनाव चरम पर है और आगामी चुनावी तैयारियों के बीच सांप्रदायिक मुद्दों पर बहस तेज़ हो गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और सड़क — दोनों पर और गरमाने की संभावना है।