भारत में टीबी समाप्ति के लिए नई 100 दिन की मुहिम, जन भागीदारी की आवश्यकता
सारांश
Key Takeaways
- टीबी मुक्त भारत अभियान का नया चरण शुरू हुआ है।
- जन भागीदारी को प्राथमिकता दी गई है।
- 2 लाख से अधिक युवा वॉलंटियर्स सक्रिय हैं।
- टीबी के मामलों में 21 प्रतिशत की कमी आई है।
- टीबी की पहचान के तरीके में बदलाव किया जा रहा है।
नई दिल्ली, 24 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारत में टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) को समाप्त करने का प्रयास अब एक नई ऊर्जा और गति के साथ आगे बढ़ रहा है। सरकार ने 'टीबी मुक्त भारत अभियान' के अंतर्गत 100 दिनों का एक नया अभियान शुरू किया है, जो इस चुनौती को और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने इस अवसर पर जन भागीदारी पर जोर दिया। उनका मानना है कि जब समाज एकजुट होता है, तभी ऐसे बड़े स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव हो पाता है।
यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण से प्रेरित है, जिसमें हर नागरिक की भागीदारी को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यही कारण है कि अब टीबी से लड़ाई केवल सरकार या डॉक्टरों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसमें गांवों की पंचायतों, युवाओं और आम जनता सभी की भागीदारी हो रही है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सूचित किया, "भारत का टीबी (तपेदिक) को समाप्त करने का अभियान नई गति के साथ जारी है। देश 'टीबी मुक्त भारत अभियान' के एक नए चरण, '100 दिन के अभियान', की शुरुआत कर रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने प्रगति को तेज करने में जन भागीदारी और समाज के सहयोग की शक्ति पर अपने विचार साझा किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच से प्रेरित, इस सामूहिक प्रयास ने सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित पहलों को मजबूती दी है और भारत को 'टीबी मुक्त भारत' बनाने के लक्ष्य के और करीब ला दिया है।"
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने टीबी के खिलाफ लड़ाई में कई महत्वपूर्ण सफलताएँ हासिल की हैं। वर्ष 2015 के बाद से टीबी के मामलों में लगभग 21 प्रतिशत की कमी आई है, जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुना है। वहीं, टीबी से होने वाली मौतों में भी लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि जब विज्ञान, प्रणाली और समाज मिलकर काम करते हैं, तो बड़े बदलाव संभव होते हैं।
इस अभियान की एक विशेषता यह है कि इसमें 'टीबी विजेता', यानी जो लोग इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं, को भी शामिल किया गया है। ये लोग अब दूसरों को जागरूक कर रहे हैं और इलाज के दौरान उनका मनोबल बढ़ा रहे हैं। साथ ही, 'माय भारत' कार्यक्रम के तहत 2 लाख से अधिक युवा वॉलंटियर्स भी जुड़े हुए हैं, जो मरीजों को मानसिक और सामाजिक समर्थन प्रदान कर रहे हैं। इससे मरीजों को इलाज जारी रखने में सहायता मिलती है और वे अकेला नहीं महसूस करते।
एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि अब टीबी की पहचान के तरीके में बदलाव किया जा रहा है। पहले आमतौर पर उन लोगों की जांच होती थी, जिनमें लक्षण दिखाई देते थे, लेकिन अब यह पाया गया है कि लगभग आधे मरीजों में प्रारंभिक लक्षण नहीं होते। ऐसे 'साइलेंट केस' ही बीमारी को अधिक फैलाते हैं, क्योंकि व्यक्ति को स्वयं नहीं पता होता कि वह संक्रमित है। इसलिए अब सरकार ऐसे लोगों की भी जांच पर जोर दे रही है, जिनमें लक्षण नहीं हैं लेकिन वे जोखिम वाले समूह में आते हैं।