भाद्रपद पूर्णिमा पर महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती; भस्म-सिंदूर से बना बाबा का भव्य मुखारविंद
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 26 सितंबर 2026 को भाद्रपद पूर्णिमा के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। भस्म और लाल सिंदूर-चंदन से बाबा का विशेष मुखारविंद तैयार किया गया, जिसे मूंछें, त्रिनेत्र और तिलक से और भी भव्य रूप दिया गया। अलौकिक दर्शन पाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बीती रात से ही मंदिर परिसर में कतारबद्ध हो गए थे।
कपाट खुलने की परंपरा और विधि-विधान
शनिवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ बाबा महाकाल के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। मंत्रोच्चार के बीच जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। पूजा के क्रम में प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया।
कपूर आरती के पश्चात बाबा ने मुकुट धारण किया। इसके बाद झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के मंगल घोष के साथ भस्म आरती की गई। पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष और घंटियों-शंखध्वनि से गुंजायमान हो उठा।
पूर्णिमा का विशेष शृंगार
भाद्रपद पूर्णिमा के उपलक्ष्य में बाबा महाकाल का श्रृंगार विशेष रूप से भस्म और लाल सिंदूर-चंदन से किया गया। मूंछें, त्रिनेत्र और तिलक इस दिव्य मुखारविंद की शोभा को और बढ़ाते नज़र आए। मान्यता है कि भस्म अर्पण के पश्चात भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं — और यही विश्वास हज़ारों श्रद्धालुओं को उज्जैन की पावन भूमि तक खींच लाता है।
श्रद्धालुओं की आस्था और परंपरा
परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। भस्म आरती में शामिल होने के लिए पुरुषों हेतु पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं हेतु साड़ी पहनना अनिवार्य है। महाकाल मंदिर के पुजारी ने विधि-विधान के साथ महाआरती संपन्न कराई।
गौरतलब है कि भाद्रपद पूर्णिमा पर महाकालेश्वर की भस्म आरती का महत्त्व विशेष रूप से बढ़ जाता है, क्योंकि इस तिथि को शैव परंपरा में अत्यंत पवित्र माना जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु देश के कोने-कोने से उज्जैन पहुँचे थे।
आगे की आस्था-यात्रा
महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भोर में होने वाली भस्म आरती भारत की सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक परंपराओं में से एक है। विशेष तिथियों और पर्वों पर यह आयोजन और भव्य रूप लेता है, जिससे श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। आने वाले पर्वों पर भी इसी प्रकार की भव्य आरती और विशेष शृंगार की परंपरा जारी रहेगी।