14 जुलाई 2026
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भौमवती अमावस्या पर महाकाल का भांग-भस्म शृंगार, उज्जैन में उमड़े हजारों श्रद्धालु

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भौमवती अमावस्या पर महाकाल का भांग-भस्म शृंगार, उज्जैन में उमड़े हजारों श्रद्धालु

सारांश

भौमवती अमावस्या का दुर्लभ संयोग और महाकाल का भांग-भस्म शृंगार — उज्जैन में मंगलवार की भोर अलौकिक थी। हजारों श्रद्धालु रातभर कतार में खड़े रहे, और जब पट खुले तो 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से पूरा परिसर गूंज उठा।

मुख्य बातें

भौमवती अमावस्या ( 14 जुलाई 2026 ) पर उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में विशेष भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल का भांग से विशेष शृंगार किया गया और तत्पश्चात भस्म रमाकर दिव्य दर्शन दिए गए।
अभिषेक में पंचामृत — दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस — का उपयोग हुआ।
अब भस्म आरती में श्मशान राख की जगह कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म प्रयुक्त होती है।
भस्म आरती में प्रवेश के लिए पुरुषों को धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है।
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर परिसर में पुलिस बल की व्यापक तैनाती की गई।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भौमवती अमावस्या के पावन अवसर पर 14 जुलाई 2026 को बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई, जिसमें विशेष रूप से भांग से बाबा का दिव्य शृंगार किया गया। तड़के से ही मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी, जो रातभर कतार में खड़े रहकर अपने आराध्य के दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे।

मुख्य घटनाक्रम

मंगलवार की भोर में भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच बाबा महाकाल के पट खोले गए। इसके उपरांत जलाभिषेक के साथ दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक किया गया। भौमवती अमावस्या के विशेष संयोग पर बाबा को भांग से सजाया गया और तत्पश्चात भस्म रमाकर उन्होंने भक्तों को दिव्य स्वरूप में दर्शन दिए।

दर्शन होते ही समूचा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। घंटियों की टंकार, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार ने वातावरण को अलौकिक बना दिया।

भस्म आरती की विशेषता

मंदिर के पुजारियों के अनुसार, पूर्व में बाबा महाकाल को श्मशान की राख अर्पित करने की परंपरा थी, किंतु अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष रूप से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। यह परिवर्तन परंपरा को स्वास्थ्य-सम्मत रूप में संरक्षित करने का प्रयास है।

भस्म आरती के दौरान आस्था की एक विशेष परंपरा का पालन होता है — पुरुष श्रद्धालुओं के लिए धोती-सोला और महिला श्रद्धालुओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।

आम जनता पर असर

बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में अपनी दिव्यता के लिए प्रसिद्ध है। इस दर्शन-लाभ के लिए सामान्य जनमानस के साथ-साथ समाज की著名 हस्तियाँ भी उज्जैन पहुँचती हैं। भौमवती अमावस्या का विशेष संयोग होने के कारण इस बार श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य से अधिक रही।

गौरतलब है कि भौमवती अमावस्या — जब अमावस्या मंगलवार को पड़ती है — को हिंदू मान्यताओं में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। यह संयोग वर्ष में केवल एक या दो बार ही आता है, इसीलिए इस दिन महाकाल मंदिर में विशेष उत्साह रहता है।

सुरक्षा व्यवस्था

श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में पुलिसकर्मियों की व्यापक तैनाती की गई। कतार प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे, ताकि श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन हो सकें।

यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि महाकालेश्वर मंदिर की आस्था और परंपरा आज भी लाखों भक्तों के जीवन का केंद्र बिंदु है। आने वाले त्योहारों पर भी इसी प्रकार के विशेष आयोजनों की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। भौमवती अमावस्या जैसे दुर्लभ संयोगों पर उमड़ने वाली भीड़ यह दर्शाती है कि श्रद्धा और परंपरा आज भी लाखों भारतीयों के जीवन में केंद्रीय स्थान रखती है। हालांकि, इतनी बड़ी भीड़ के प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा का प्रश्न हर बार उठता है — मंदिर प्रशासन और स्थानीय प्रशासन के लिए यह एक सतत चुनौती है जिस पर दीर्घकालिक योजना आवश्यक है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भौमवती अमावस्या क्या होती है और यह महाकाल के लिए विशेष क्यों है?
भौमवती अमावस्या वह अमावस्या होती है जो मंगलवार के दिन पड़ती है। हिंदू मान्यताओं में यह अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है और वर्ष में केवल एक-दो बार ही आती है, इसीलिए इस दिन महाकालेश्वर मंदिर में विशेष शृंगार और भस्म आरती का आयोजन होता है।
महाकाल की भस्म आरती में किस प्रकार की भस्म का उपयोग होता है?
पहले बाबा महाकाल को श्मशान की राख अर्पित की जाती थी, लेकिन अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष रूप से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। यह परंपरा को स्वास्थ्य-सम्मत रूप में संरक्षित करने का प्रयास है।
भस्म आरती में दर्शन के लिए क्या पहनना अनिवार्य है?
भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए धोती-सोला और महिला श्रद्धालुओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह मंदिर की पारंपरिक आचार संहिता का हिस्सा है।
भौमवती अमावस्या पर महाकाल का शृंगार कैसे किया गया?
14 जुलाई 2026 को भौमवती अमावस्या पर बाबा महाकाल का भांग से विशेष शृंगार किया गया। इसके बाद पंचामृत अभिषेक और भस्म आरती के पश्चात वे दिव्य स्वरूप में भक्तों को दर्शन देने के लिए प्रकट हुए।
महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती कितनी प्रसिद्ध है?
बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में अपनी दिव्यता और अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। इसे देखने के लिए सामान्य श्रद्धालुओं के साथ-साथ著名 हस्तियाँ भी उज्जैन पहुँचती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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