सुप्रीम कोर्ट मार्च पर BJP नेता प्रतुल शाहदेव बोले — 'कांग्रेस पर अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता प्रतुल शाहदेव ने 12 अक्टूबर 2026 को रांची में कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित मार्च को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि देश के इतिहास में पहली बार कोई राजनीतिक दल सर्वोच्च न्यायालय का घेराव करने की कोशिश कर रहा है, और ऐसा करने वालों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
मुख्य घटनाक्रम
यह विवाद तब शुरू हुआ जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने 'इंडिया' गठबंधन के प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात की अपील को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद कांग्रेस ने देश भर से अपने विधायकों, सांसदों, वरिष्ठ नेताओं और राज्य व राष्ट्रीय पदाधिकारियों को बुलाकर सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने की घोषणा की।
शाहदेव ने कहा, 'मार्च' तो महज एक लेबल है। उनके अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में नेताओं को दिल्ली बुलाना स्पष्ट रूप से संवैधानिक संस्था पर दबाव बनाने की कोशिश है।
BJP का रुख और आरोप
प्रतुल शाहदेव ने अपने बयान में कहा, 'पहले कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त का घेराव किया और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा। उसी विरोध प्रदर्शन के दौरान वे आकाशवाणी का भी घेराव करने पहुँच गए, मानो वे प्रसारण निगम पर कब्जा करना चाहते हों।' उन्होंने माँग की कि सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ 'विधि सम्मत कार्रवाई' की जाए।
शाहदेव ने यह भी कहा कि CJI की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि किसी राजनीतिक दल को मुलाकात देना उचित नहीं है और यदि कोई शिकायत है तो याचिका दाखिल की जाए — जिस पर सुनवाई पहले से जारी है। उनके अनुसार, विचाराधीन मामले पर दबाव बनाने के लिए न्यायालय का घेराव करना अवमानना के दायरे में आता है।
सीजेपी नेताओं को जमानत
इस बीच, BJP नेता विनुशा रेड्डी ने बताया कि सीजेपी (CJP) के तीन नेताओं — अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका — को शांति बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के बाद जमानत दी गई है। रेड्डी के अनुसार, तीनों ने कथित तौर पर एक अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें वचन दिया गया है कि वे एक वर्ष तक शांति भंग करने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।
सरकार और न्यायपालिका की भूमिका
गौरतलब है कि भारत में किसी राजनीतिक दल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को इस प्रकार घेरने की कोशिश की कोई स्थापित मिसाल नहीं है। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, न्यायालय में विचाराधीन किसी मामले पर सार्वजनिक दबाव बनाना न्यायिक स्वतंत्रता की दृष्टि से संवेदनशील प्रश्न खड़े करता है। CJI का यह रुख — कि शिकायत हो तो याचिका के माध्यम से आएं — संस्थागत प्रोटोकॉल के अनुरूप बताया जा रहा है।
आगे क्या होगा
कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'इंडिया' गठबंधन का यह मार्च राजनीतिक तनाव को और गहरा कर सकता है। दिल्ली पुलिस की भूमिका, मार्च को अनुमति मिलती है या नहीं, और न्यायालय की प्रतिक्रिया — ये तीनों पहलू आने वाले दिनों में निर्णायक होंगे। यह विवाद न्यायपालिका और राजनीतिक दलों के बीच की सीमा-रेखा को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ले आया है।