राऊज एवेन्यू कोर्ट ने BJP विधायक राजू सिंह को सुनाई 4 साल की सजा, बिहार विधानसभा सदस्यता पर संकट
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने 4 जुलाई 2026 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की साहिबगंज विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक राजू सिंह को 31 दिसंबर 2018 की रात हुई हर्ष फायरिंग की जानलेवा घटना में चार साल की सजा सुनाई। अदालत ने उन्हें गैर-इरादतन हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया, जिससे उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द होने का खतरा पैदा हो गया है।
मुख्य घटनाक्रम
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 31 दिसंबर 2018 की रात नए साल के जश्न के दौरान हुई हर्ष फायरिंग में एक गोली आर्किटेक्ट अर्चना गुप्ता को लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गईं। इलाज के दौरान 3 जनवरी 2019 को उनकी मृत्यु हो गई। अदालत ने इसी मामले में राजू सिंह की पत्नी रेनू सिंह और दो अन्य आरोपियों — राणा सिंह एवं रामेंद्र सिंह — को बरी कर दिया।
विधानसभा सदस्यता पर कानूनी संकट
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) के अनुसार, यदि संसद या विधानसभा का कोई सदस्य किसी अपराध में दोषी ठहराया जाए और उसे दो वर्ष या उससे अधिक की सजा हो, तो वह दोषसिद्धि की तारीख से ही अयोग्य हो जाता है — जब तक कोई सक्षम अदालत राहत न दे। राजू सिंह को चार साल की सजा मिली है, इसलिए इस प्रावधान के तहत उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है और साहिबगंज विधानसभा सीट रिक्त हो सकती है।
राजू सिंह का राजनीतिक सफर
राजपूत समुदाय से आने वाले राजू सिंह ने अपने राजनीतिक करियर में कई दल बदले। वह 2005 में पहली बार लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के टिकट पर साहिबगंज से बिहार विधानसभा पहुँचे। 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले वह विकासशील इंसान पार्टी (VIP) में शामिल हुए और अपनी सीट बरकरार रखी। 2022 में उन्होंने VIP छोड़कर BJP का दामन थामा, जिसके बाद उन्हें बिहार सरकार में मंत्री पद मिला। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह BJP उम्मीदवार के रूप में साहिबगंज से विजयी हुए।
BJP के लिए राजनीतिक झटका
यह फैसला BJP के लिए स्पष्ट रूप से एक बड़ा राजनीतिक झटका है। गौरतलब है कि यह मामला करीब सात वर्षों से अदालत में चल रहा था और अब दोषसिद्धि के बाद पार्टी को बिहार में अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब बिहार में राजनीतिक समीकरण पहले से ही संवेदनशील हैं।
आगे की कानूनी राह
अब राजू सिंह के पास उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प है। यदि कोई सक्षम अदालत सजा पर रोक लगाती है, तो उनकी सदस्यता अंतरिम रूप से बहाल हो सकती है। फैसले के खिलाफ अपील और उसके परिणाम ही इस मामले की आगे की दिशा तय करेंगे।