बॉम्बे हाईकोर्ट गोवा बेंच का आदेश: SIR के दौरान मौजूदा वोटर लिस्ट नजरअंदाज नहीं होगी
सारांश
मुख्य बातें
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने 5 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट कहा कि मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया के दौरान नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के अंतिम रूप से प्रकाशित होने तक मौजूदा मतदाता सूची पूरी तरह प्रभावी रहेगी और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि SIR की मौजूदा प्रक्रिया से पहले से पंजीकृत मतदाता प्रभावी रूप से मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
मुख्य घटनाक्रम
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को स्मरण कराया कि सर्वोच्च न्यायालय यह पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सभी पात्र भारतीय नागरिकों को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करना आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। बेंच ने रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 का हवाला देते हुए यह रेखांकित किया कि ड्राफ्ट सूची के अंतिम होने से पहले मौजूदा सूची ही कानूनी रूप से मान्य रहती है।
जस्टिस मेनेजेस ने टिप्पणी की कि चुनाव आयोग भले ही यह दलील दे रहा हो कि अभी केवल ड्राफ्ट सूची पर विचार किया जा रहा है, परंतु SIR प्रक्रिया का व्यावहारिक असर मौजूदा वोटर लिस्ट पर स्पष्ट रूप से पड़ रहा है। अदालत ने सीधे शब्दों में कहा — 'हम मौजूदा सूची को नजरअंदाज नहीं कर सकते।'
फॉर्म 6 और फॉर्म 8 पर अदालत की आपत्ति
बेंच ने उन मतदाताओं की स्थिति पर विशेष ध्यान दिलाया जो अपना निवास स्थान बदल चुके हैं और फॉर्म 8 के माध्यम से अपना पता अपडेट करवाना चाहते हैं। जस्टिस मेनेजेस ने सवाल उठाया कि जब किसी मतदाता का नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज है, तो सिर्फ इसलिए उसे फॉर्म 6 भरने के लिए क्यों बाध्य किया जाए कि SIR के दौरान तैयार ड्राफ्ट रोल में उसका नाम दिखाई नहीं दे रहा।
गौरतलब है कि फॉर्म 6 का उपयोग मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने के लिए होता है, जबकि पते में बदलाव के लिए फॉर्म 8 निर्धारित प्रक्रिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले से पंजीकृत मतदाता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह खुद को नए मतदाता की तरह पंजीकरण करवाए।
प्री-फील्ड एनुमेरेशन फॉर्म पर सवाल
बेंच ने SIR के दौरान उपयोग किए जा रहे प्री-फील्ड एनुमेरेशन फॉर्म की प्रक्रिया पर भी गंभीर आपत्ति जताई। इस फॉर्म में मतदाता को यह घोषणा करनी होती है कि वह मौजूदा मतदाता सूची में दर्ज पते पर ही निवास कर रहा है। अदालत ने कहा कि यदि किसी मतदाता ने अपना घर बदल लिया है, तो उससे ऐसी घोषणा करवाना उसे झूठी जानकारी देने के लिए मजबूर करना होगा।
जस्टिस मेनेजेस ने सीधा सवाल किया कि क्या किसी नागरिक को प्री-फील्ड एनुमेरेशन फॉर्म जमा करते समय गलत घोषणा करने के लिए विवश किया जा सकता है? अदालत ने कहा कि ऐसे मतदाताओं को सीधे फॉर्म 8 जमा करने का विकल्प मिलना चाहिए।
मताधिकार की रक्षा पर जोर
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि SIR प्रक्रिया जारी रहने के दौरान मौजूदा मतदाता सूची को देखने की जरूरत नहीं है। बेंच की राय में एसआईआर के जरिए नागरिकों को प्रभावी रूप से मौजूदा वोटर लिस्ट से ही बाहर किया जा रहा है, न कि केवल ड्राफ्ट रोल से।
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में SIR प्रक्रिया को लेकर विभिन्न राज्यों में सवाल उठ रहे हैं और नागरिक अधिकार संगठन मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की शिकायतें कर रहे हैं। गोवा बेंच की यह टिप्पणी देश के अन्य हाईकोर्ट में लंबित समान मामलों पर भी असर डाल सकती है।
आगे क्या होगा
अदालत ने चुनाव आयोग से अपेक्षा की है कि वह ऐसी प्रक्रिया सुनिश्चित करे जिसमें पहले से पंजीकृत मतदाताओं को अपने विवरण में बदलाव के लिए व्यावहारिक और कानूनसम्मत विकल्प मिले। मामले की अगली सुनवाई में चुनाव आयोग को अपना पक्ष और विस्तृत जवाब प्रस्तुत करना होगा। इस फैसले की दिशा से यह तय होगा कि SIR जैसी प्रक्रियाएँ भविष्य में किस ढाँचे के तहत संचालित होंगी।