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सुप्रीम कोर्ट आज सुनाएगा ECI की विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर ऐतिहासिक फैसला

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सुप्रीम कोर्ट आज सुनाएगा ECI की विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर ऐतिहासिक फैसला

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय आज उस विवादास्पद SIR प्रक्रिया पर फैसला सुनाएगा, जिसमें लाखों मतदाताओं को 2002 की पुरानी सूचियों से अपना पैतृक संबंध साबित करना अनिवार्य है। यह निर्णय चुनाव आयोग की शक्तियों की संवैधानिक सीमा और हाशिए के समुदायों के मताधिकार, दोनों को परिभाषित करेगा।

मुख्य बातें

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ 27 मई 2026 को ECI की SIR प्रक्रिया पर फैसला सुनाएगी।
विवाद का केंद्र वह शर्त है जिसके तहत 2002/2003 की मतदाता सूची से बाहर रहे लोगों को पैतृक संबंध साबित करना होगा।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 326 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय के निर्देश पर सत्यापन दस्तावेजों की सूची में आधार कार्ड को भी जोड़ा गया।
SIR प्रक्रिया बिहार से शुरू होकर पश्चिम बंगाल , केरल और तमिलनाडु तक विस्तारित हुई।
पीठ ने 29 जनवरी को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था।

सर्वोच्च न्यायालय बुधवार, 27 मई 2026 को उन याचिकाओं पर अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाएगा, जिनमें भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) की प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से चुनौती दी गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ यह निर्णय सुनाएगी, जो करोड़ों मतदाताओं के मताधिकार को सीधे प्रभावित कर सकता है।

विवाद का मूल

यह मामला चुनाव आयोग की उस शर्त को लेकर है, जिसके तहत वर्ष 2002 (या कुछ राज्यों में 2003) की मतदाता सूची में नाम न रहे मतदाताओं को अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति से पैतृक संबंध दर्शाना होगा, जिसका नाम उस समय की सूची में दर्ज था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अंतर्गत चुनाव आयोग को प्रदत्त शक्तियों से परे है।

हाशिए के समुदायों पर असर की आशंका

याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष दलील दी कि यह प्रक्रिया विशेष रूप से प्रवासी मजदूरों, आदिवासी समुदायों और अन्य हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए बाधा बन सकती है, क्योंकि उनके पास दो दशक पुरानी मतदाता सूचियों से वंशावली जोड़ने वाले दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध नहीं हो सकते। आलोचकों का कहना है कि यह शर्त वास्तविक भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित कर सकती है।

न्यायालय के अंतरिम निर्देश

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने पारदर्शिता बढ़ाने और प्रभावित मतदाताओं की कठिनाइयाँ कम करने के उद्देश्य से कई अंतरिम निर्देश जारी किए। चुनाव आयोग ने शुरुआत में सत्यापन के लिए 11 दस्तावेज़ निर्धारित किए थे, जिनमें बाद में न्यायालय के निर्देश पर आधार कार्ड को भी शामिल किया गया।

SIR प्रक्रिया का विस्तार

अधिकांश याचिकाएँ पिछले वर्ष जून में तब दायर की गई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में SIR प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद इसे पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु सहित कई अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया जब कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ चल रही थीं।

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग ने न्यायालय में यह स्थिति स्पष्ट की कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करना और डुप्लीकेट अथवा अयोग्य नामों को हटाना है। आयोग के अनुसार, यह प्रक्रिया चुनावी प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है। दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पीठ ने 29 जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

आगे क्या

आज का फैसला तय करेगा कि SIR प्रक्रिया संवैधानिक दायरे में है या नहीं। यदि न्यायालय याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय देता है, तो चुनाव आयोग को अपनी सत्यापन प्रक्रिया में बड़े बदलाव करने होंगे। फैसले का असर आगामी राज्य चुनावों की तैयारियों पर भी पड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिनमें अधिकांश आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के हैं। चुनाव आयोग का 'सूची शुद्धि' तर्क वैध है, लेकिन जब सत्यापन का बोझ उन्हीं पर पड़े जो सबसे कम सक्षम हैं, तो यह सुधार नहीं, बहिष्करण बन जाता है। मुख्यधारा की कवरेज इस तथ्य को अक्सर नज़रअंदाज़ करती है कि यह मामला बिहार से शुरू होकर उन्हीं राज्यों तक फैला जहाँ विपक्षी सरकारें हैं — यह संयोग राजनीतिक संदेह को जन्म देता है, भले ही आयोग की मंशा तकनीकी हो।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट आज किस मामले पर फैसला सुनाएगा?
सर्वोच्च न्यायालय आज भारत निर्वाचन आयोग की 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाएगा। यह प्रक्रिया मतदाता सूचियों की शुद्धि के लिए शुरू की गई थी, जिसमें कुछ मतदाताओं से पैतृक संबंध साबित करने की शर्त रखी गई है।
ECI की SIR प्रक्रिया क्या है और इसे क्यों चुनौती दी गई?
SIR यानी 'विशेष गहन पुनरीक्षण' वह प्रक्रिया है जिसके तहत चुनाव आयोग मतदाता सूचियों में डुप्लीकेट और अयोग्य नाम हटाता है। इसे इसलिए चुनौती दी गई क्योंकि इसमें 2002/2003 की सूची से बाहर रहे मतदाताओं से पैतृक संबंध साबित करने की शर्त रखी गई, जिसे याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 326 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का उल्लंघन बताया।
SIR प्रक्रिया किन राज्यों में लागू हुई?
SIR प्रक्रिया सबसे पहले बिहार में शुरू हुई, जिसके बाद इसे पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु सहित कई अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। अधिकांश याचिकाएँ पिछले वर्ष जून में बिहार में प्रक्रिया शुरू होने के बाद दायर की गई थीं।
इस फैसले से किन मतदाताओं पर सबसे अधिक असर पड़ेगा?
फैसले का सबसे अधिक असर प्रवासी मजदूरों, आदिवासी समुदायों और अन्य हाशिए पर रहने वाले वर्गों पर पड़ेगा। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इन्हीं लोगों के पास दो दशक पुरानी मतदाता सूचियों से वंशावली जोड़ने वाले दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध होने की संभावना सबसे कम है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने क्या अंतरिम निर्देश दिए?
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने पारदर्शिता बढ़ाने और प्रभावित मतदाताओं की कठिनाइयाँ कम करने के लिए कई अंतरिम निर्देश जारी किए। इनमें सबसे उल्लेखनीय निर्देश आधार कार्ड को सत्यापन दस्तावेज़ों की सूची में शामिल करने का था, जबकि चुनाव आयोग ने मूलतः केवल 11 दस्तावेज़ निर्धारित किए थे।
राष्ट्र प्रेस
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